हाईकोर्ट के साये में रांची पहाड़ी मंदिर विवाद गरमाया, नयी-पुरानी समितियों में आरोप-प्रत्यारोप तेज

“यह पूरा विवाद केवल रांची पहाड़ी मंदिर प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता, प्रशासनिक हस्तक्षेप और जवाबदेही की व्यापक बहस को जन्म देता है…
रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के प्रतिष्ठित पहाड़ी मंदिर (रांची पहाड़ी मंदिर) के प्रबंधन को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा गठित नवगठित पहाड़ी मंदिर प्रबंध समिति 4 मई को दिन के 11 बजे औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण करेगी। इस बीच नयी और पुरानी समितियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। जिससे पूरे मामले ने प्रशासनिक, कानूनी और पारदर्शिता से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
नवगठित समिति के सचिव राकेश सिन्हा ने प्रेस वार्ता कर बताया कि सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एस.एन. पाठक के नेतृत्व में समिति विधिसम्मत तरीके से गठित की गई है। यह गठन झारखंड हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में किया गया है।
पूर्व समिति को 9 जनवरी 2026 और 10 अप्रैल को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर 23 अप्रैल को बोर्ड बैठक में नई समिति का गठन किया गया।
वित्तीय पारदर्शिता पर उठे सवालः नयी समिति ने सबसे गंभीर आरोप मंदिर परिसर में रखी करोड़ों रुपये मूल्य की लोहे और प्लास्टिक सामग्री की बिक्री को लेकर लगाया है।
सचिव राकेश सिन्हा ने 29 दिसंबर 2024 के पत्र का हवाला देते हुए दावा किया कि बिना किसी विधिवत निविदा प्रक्रिया और सरकारी मूल्यांकन के इन सामग्रियों को बेच दिया गया। यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला होगा बल्कि धार्मिक संस्थानों में जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लगाएगा।
विकास बनाम हस्तक्षेप की बहसः समिति सदस्य बादल सिंह ने बताया कि मंदिर के समग्र विकास और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के विस्तार के लिए 6.74 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत कराने का प्रयास किया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग ठेकेदारी प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप कर योजनाओं को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे वित्तीय अनियमितताओं की आशंका बढ़ रही है।
उन्होंने यह भी घोषणा की कि मंदिर परिसर में वीआईपी संस्कृति समाप्त कर समान व्यवस्था लागू की जाएगी, जो सामाजिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पुरानी समिति का पलटवारः दूसरी ओर पहाड़ी मंदिर विकास समिति के सदस्य राजेश गड़ोदिया और सौरभ चौधरी ने नयी समिति के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताया है। उनका कहना है कि उनके कार्यकाल में सभी वित्तीय कार्य जिला प्रशासन की निगरानी में हुए हैं और सभी रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।
पुरानी समिति ने नयी समिति पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि असली मुद्दा चार लाख रुपये के ट्रांसफर का है, जो कथित रूप से राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड को भेजे गए थे, लेकिन उस समय के सचिव राकेश सिन्हा के निजी खाते में जमा हुए। यह आरोप यदि प्रमाणित होता है तो यह मामला व्यक्तिगत जवाबदेही और वित्तीय नैतिकता के स्तर पर बेहद गंभीर हो सकता है।
कानूनी पेच और अनिश्चितताः मामले की संवेदनशीलता इस बात से भी बढ़ जाती है कि यह पूरा विवाद फिलहाल झारखंड हाईकोर्ट में लंबित है। इस पर रिट याचिका और अवमानना याचिका दोनों पर सुनवाई जारी है।
पुरानी समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि बिना न्यायालय की अनुमति के नयी समिति जबरन पदभार ग्रहण करने का प्रयास करती है तो यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
धार्मिक संस्थानों में पारदर्शिता की परीक्षाः यह पूरा विवाद केवल एक मंदिर प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में धार्मिक संस्थानों की पारदर्शिता, प्रशासनिक हस्तक्षेप और जवाबदेही की व्यापक बहस को जन्म देता है। एक ओर नयी समिति विधिक वैधता और सुधार की बात कर रही है। वहीं पुरानी समिति प्रक्रियात्मक और नैतिक सवाल उठा रही है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या 4 मई को प्रस्तावित पदभार ग्रहण सुचारु रूप से हो पाएगा या यह विवाद और गहराएगा। अंतिम निर्णय न्यायालय के रुख और प्रशासनिक सख्ती पर निर्भर करेगा।
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