“यह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की झलक है। झारखंड जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, वहां इस तरह की व्यवस्थागत खामियां सीधे लोगों की जिंदगी पर असर डालती हैं…”
✍️ मुकेश भारतीय
रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची में स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) एक बार फिर चर्चा में है। लेकिन इस बार किसी नई सुविधा या उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि उस दर्दनाक हकीकत के लिए, जिसे एक तस्वीर ने बयां कर दिया। तस्वीर में एक महिला ट्रॉली खींच रही है, दूसरी महिला साथ में है और ट्रॉली पर एक बीमार व्यक्ति लेटा हुआ है।
शर्मनाक कि साथ में एक छोटा बच्चा भी चल रहा है, जो शायद समझ भी नहीं पा रहा कि वह अस्पताल में है या किसी परीक्षा में शामिल है। यह दृश्य किसी आपदा क्षेत्र का नहीं, बल्कि राज्य के सबसे बड़े अस्पताल का है, जहां इलाज मिलने से पहले व्यवस्था से जूझना अनिवार्य हो गया है।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की तस्वीर है, जो कागजों पर मजबूत और जमीन पर कमजोर दिखाई देता है। मरीज घासू चित्रकार, जो सोनाहातू के रहने वाले हैं, पिछले डेढ़ महीने से अस्पताल के हड्डी विभाग में भर्ती हैं। सड़क दुर्घटना के बाद उनका इलाज चल रहा है।
डॉक्टरों ने उन्हें ट्रैक्शन पर रखा है और अब एमआरआई जांच की सलाह दी गई, ताकि यह तय किया जा सके कि ऑपरेशन करना है या नहीं। लेकिन यहां से शुरू होती है असली कहानी इलाज की नहीं, बल्कि इलाज तक पहुंचने की जद्दोजहद की।
एमआरआई सेंटर अस्पताल के उस हिस्से में स्थित है, जहां तक पहुंचने के लिए करीब 500 मीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। यह दूरी सुनने में भले छोटी लगे, लेकिन जब मरीज ट्रॉली पर हो, परिजन खुद ट्रॉली खींच रहे हों, और बाहर चिलचिलाती गर्मी हो, तब यही 500 मीटर किसी पहाड़ से कम नहीं लगता।
तस्वीर में दिख रही महिलाएं एक मां और एक पत्नी अपने बीमार परिजन को ट्रॉली पर खींचते हुए ले जा रही हैं। उनके चेहरे पर थकान साफ झलक रही है, कपड़े पसीने से भीगे हुए हैं, लेकिन उनके पास रुकने का विकल्प नहीं है। क्योंकि अस्पताल में सुविधा नहीं, मजबूरी चलती है।
करीब 20 मिनट की मशक्कत के बाद जब वे एमआरआई सेंटर पहुंचते हैं तो वहां एक और परीक्षा उनका इंतजार कर रही होती है लंबी कतार। दोपहर 12:30 बजे पहुंचे मरीज की जांच शाम 4:30 बजे होती है। यानी चार घंटे का इंतजार।
इस दौरान मरीज ट्रॉली पर ही पड़ा रहता है, परिजन उसके पास खड़े रहते हैं और समय धीरे-धीरे गुजरता है। यह सिर्फ इंतजार नहीं, बल्कि सिस्टम की धीमी गति का प्रतीक है, जो हर दिन मरीजों की उम्मीदों को खींचता रहता है।
विडंबना यह है कि डॉक्टर ने एमआरआई की सलाह तो दे दी, लेकिन यह ध्यान नहीं रखा कि मरीज ट्रैक्शन में है और उसमें लगा रॉड पहले हटाना जरूरी है। जब परिजन एमआरआई सेंटर पहुंचते हैं तो टेक्निशियन उन्हें वापस भेज देते हैं।
कहते हैं कि पहले रॉड हटाइए। यानी एक बार फिर वही 500 मीटर की दूरी तय करनी होगी। यह सिर्फ एक गलती नहीं, बल्कि उस समन्वय की कमी का उदाहरण है, जो अस्पताल के विभिन्न विभागों के बीच होनी चाहिए।
इस पूरी व्यवस्था में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या मरीज का दर्द सिर्फ उसकी बीमारी तक सीमित है? या फिर उसे हर कदम पर सिस्टम की कमियों का भी सामना करना पड़ता है? जब एक बीमार व्यक्ति को ट्रॉली पर खींचकर इतनी दूर ले जाना पड़े, तो यह सिर्फ सुविधा की कमी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी भी है।
दरअसल, जब एमआरआई सेंटर को अस्पताल के दूसरे हिस्से में शिफ्ट किया गया था, तब रेडियोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इससे गंभीर मरीजों को परेशानी होगी। उन्होंने कहा था कि लंबी दूरी तय करना मुश्किल होगा, खासकर उन मरीजों के लिए जो चल-फिर नहीं सकते। लेकिन उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया गया। शायद इसलिए क्योंकि फैसले लेने वाले लोग खुद कभी ट्रॉली खींचकर अस्पताल के गलियारों से नहीं गुजरे।
अस्पताल में टेक्नीशियन की कमी भी एक बड़ी समस्या है। जहां 24 घंटे सेवा देने के लिए कम से कम आठ टेक्नीशियन चाहिए, वहां सिर्फ दो लोग काम कर रहे हैं। नतीजा हर दिन सिर्फ 12 से 15 मरीजों की जांच हो पाती है और वेटिंग लिस्ट 10 से 15 दिनों तक पहुंच जाती है। यानी अगर मरीज को तुरंत जांच की जरूरत है तो उसे इंतजार करना ही होगा, चाहे उसकी हालत कितनी भी गंभीर क्यों न हो।
यह स्थिति सिर्फ एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की झलक है। झारखंड जैसे राज्य में जहां बड़ी आबादी सरकारी अस्पतालों पर निर्भर है, वहां इस तरह की व्यवस्थागत खामियां सीधे लोगों की जिंदगी पर असर डालती हैं। गांवों से आने वाले मरीजों के पास निजी अस्पतालों का विकल्प नहीं होता। वे उम्मीद लेकर सरकारी अस्पताल आते हैं, लेकिन यहां उन्हें उम्मीद से ज्यादा संघर्ष मिलता है।
अब बात आती है जिम्मेदारी की। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी के पास इस विभाग की कमान है। सवाल यह है कि क्या उन्हें इन जमीनी समस्याओं की जानकारी है? अगर है तो अब तक सुधार क्यों नहीं हुआ? और अगर नहीं है तो फिर यह और भी गंभीर बात है कि सिस्टम की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति तक यह दर्द पहुंच ही नहीं पा रहा।
व्यंग्य की बात यह है कि आज के दौर में जब हम डिजिटल हेल्थ, स्मार्ट हॉस्पिटल और आधुनिक तकनीक की बात करते हैं, तब एक मरीज को ट्रॉली पर 500 मीटर खींचकर ले जाना पड़ता है। यह वही देश है, जहां अंतरिक्ष में उपग्रह भेजे जा रहे हैं, लेकिन अस्पताल में मरीज को एक विभाग से दूसरे विभाग तक ले जाने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। यह विरोधाभास ही हमारी सबसे बड़ी सच्चाई है।
इस पूरी घटना में सबसे मार्मिक दृश्य वह छोटा बच्चा है, जो अपने परिजनों के साथ चल रहा है। उसके लिए यह सिर्फ एक दिन हो सकता है, लेकिन यह अनुभव उसके मन में हमेशा रहेगा। वह देख रहा है कि उसके पिता या परिजन को इलाज के लिए कितना संघर्ष करना पड़ रहा है। शायद वह बड़ा होकर यही सोचे कि बीमारी से ज्यादा डरावना सिस्टम होता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का असली उद्देश्य सिर्फ इलाज देना नहीं, बल्कि मरीज को सम्मान और सुविधा के साथ इलाज देना होता है। लेकिन जब मरीज को खुद ही अपनी व्यवस्था करनी पड़े, जब परिजन ही स्ट्रेचर बन जाएं, जब अस्पताल सिर्फ इमारत बनकर रह जाए, तब यह सोचना जरूरी हो जाता है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं।
यह घटना एक चेतावनी भी है और एक मौका भी। चेतावनी इसलिए कि अगर अब भी सुधार नहीं हुआ, तो ऐसी घटनाएं आम हो जाएंगी। और मौका इसलिए कि इसे एक उदाहरण बनाकर सिस्टम को सुधारा जा सकता है। जरूरत है सुनने की, समझने की और कार्रवाई करने की।
अंत में यही कहा जा सकता है कि यह सिर्फ 500 मीटर की दूरी नहीं है। यह दूरी है सिस्टम और संवेदनशीलता के बीच, योजना और हकीकत के बीच और मरीज की उम्मीद और उसके अनुभव के बीच।
अगर इस दूरी को कम नहीं किया गया तो हर अस्पताल में ऐसी तस्वीरें आम हो जाएंगी और तब शायद हम सिर्फ खबरें लिखते रह जाएंगे, समाधान कभी नहीं ढूंढ पाएंगे।


