रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में लंबे इंतजार के बाद झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 की नियमावली को राज्य कैबिनेट ने अंततः घटनोत्तर स्वीकृति दे दी है। लेकिन इस स्वीकृति के साथ ही एक बड़ा विवाद भी जुड़ गया है।
भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं को नियमावली में शामिल नहीं किया गया है। इससे भाषा-आधारित प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय पहचान और राजनीतिक समीकरणों पर बहस तेज हो गई है।
कैबिनेट ने जिस नियमावली को मंजूरी दी है, वह मूलतः पहले से तैयार प्रस्ताव का ही संशोधित रूप है। इसमें पहले से शामिल जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बरकरार रखा गया है, लेकिन भोजपुरी, मगही और अंगिका को फिलहाल बाहर रखा गया है।
सरकार का तर्क है कि इन भाषाओं के संबंध में एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाएगी, जो यह तय करेगी कि इन्हें क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं। समिति की अनुशंसा के बाद भविष्य में इन्हें जोड़ा जा सकता है।
यह फैसला एक तरह से अभी नहीं, बाद में संभव की नीति को दर्शाता है। जिससे तत्काल परीक्षा प्रक्रिया प्रभावित न हो, लेकिन राजनीतिक संतुलन भी बना रहे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में कुल 15 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। खास बात यह है कि राज्य में लगभग 10 वर्षों के बाद JTET आयोजित होने जा रहा है।
आवेदन प्रक्रिया 21 अप्रैल से शुरू हो चुकी है। न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष तय की गई है। 2016 के बाद पहली बार परीक्षा होने के कारण अभ्यर्थियों को 9 वर्ष की आयु सीमा में छूट दी जाएगी।
यह कदम हजारों अभ्यर्थियों के लिए राहत लेकर आया है, जो वर्षों से इस परीक्षा का इंतजार कर रहे थे। लेकिन भाषा का मुद्दा इस राहत पर सवाल भी खड़ा कर रहा है।
भाषा को लेकर मतभेद पहले से ही स्पष्ट थे। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने पिछली कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव का विरोध किया था, जिसके कारण उस समय इसे पारित नहीं किया जा सका।
हालांकि 28 अप्रैल की बैठक में इसे फिर से उसी पुराने स्वरूप में लाया गया और अंततः मंजूरी मिल गई। दीपिका पांडेय सिंह ने बैठक में यह जरूर कहा कि नियमावली को और बेहतर बनाया जा सकता था, लेकिन परीक्षा कराना जरूरी है। भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता को स्पष्ट करता है।
झारखंड जैसे बहुभाषी राज्य में भाषा सिर्फ संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और अधिकार का सवाल भी है। भोजपुरी, मगही और अंगिका बोलने वालों की बड़ी आबादी है, खासकर सीमावर्ती और प्रवासी प्रभाव वाले क्षेत्रों में।
इन भाषाओं को शामिल न करना कई अभ्यर्थियों के लिए अवसर की असमानता पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क प्रशासनिक व्यवहारिकता और कानूनी स्पष्टता पर आधारित है। यानी पहले यह तय हो कि ये भाषाएं “क्षेत्रीय भाषा” की श्रेणी में औपचारिक रूप से आती हैं या नहीं।
यह फैसला सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत भी देता है। एक ओर आदिवासी और स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की नीति बरकरार है। दूसरी ओर गैर-आदिवासी भाषाई समूहों में असंतोष की संभावना भी बढ़ी है। आगामी समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस और चुनावी रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
अब सबकी नजर प्रस्तावित समिति पर टिकी है। अगर समिति सकारात्मक अनुशंसा करती है तो भविष्य में इन भाषाओं को शामिल किया जा सकता है। लेकिन तब तक 2026 की JTET परीक्षा मौजूदा नियमों के तहत ही आयोजित होगी।
बहरहाल हम तह सकते हैं कि JETET 2026 की नियमावली एक तरफ लंबे इंतजार के बाद भर्ती प्रक्रिया को गति देने का प्रयास है तो दूसरी तरफ यह भाषा और पहचान की जटिल बहस को भी सामने लाती है।
सरकार ने फिलहाल व्यावहारिक रास्ता चुना है, लेकिन यह फैसला आने वाले दिनों में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कितनी गूंज पैदा करता है, यह देखना बाकी है।


