
रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची में जमीन का खेल भी बड़ा अजीब है बाबू! जमीन आदिवासी की, रह रहा कोई और, बेचने वाला कोई और, कब्जा दिलाने वाला कोई और। और जब मामला कोर्ट पहुंचा तो कागज देखकर कानून भी बोला कि ई कौन सा नया एपिसोड चालू हो गया है।
मधुकम के शिव दुर्गा मंदिर रोड वाले आदिवासी जमीन विवाद में महादेव उरांव को सुप्रीम कोर्ट से भी ऐसा झटका लगा है कि अब मामला जमीन से निकलकर सीधे “कागज में कौन क्या छिपाया था” वाले चैप्टर में पहुंच गया है।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने महादेव उरांव की एसएलपी पर सुनवाई की। मामला सुनते ही अदालत का तेवर कुछ ऐसा हुआ कि माहौल में एसी चल रहा था, लेकिन पसीना बाहर से नहीं… अंदर से निकल रहा था।
पीठ की टिप्पणी का सार यही था कि पहले पीड़ित परिवारों से पैसा लेकर जमीन बेच दी, फिर उन्हीं जमीनों पर कब्जा दिलाने कोर्ट पहुंच गये?
अब इ बात सुनकर आम झारखंडी बोलेगा कि अरे महादेव बाबू! ई जमीन है कि रिचार्ज कूपन? पहिले पैसा लो, फिर कब्जा दिलाने कोर्ट जाओ! अदालत को भी हिसाब-किताब का कैलकुलेटर समझ लिये हैं का?
पीठ ने तो यहां तक कड़ी टिप्पणी कर दी कि मामला जालसाजी का बन सकता है। अगर केस आगे बढ़ाया गया तो 10 लाख रुपये तक का जुर्माना भी लग सकता है। बस फिर क्या था! जहां तक बात थी न्याय की लड़ाई लड़ने की, वहां तक जोश था।
लेकिन जैसे ही अदालत से दस लाख वाला शब्द निकला, मामला अचानक त्याग और तपस्या की ओर बढ़ गया। महादेव उरांव की ओर से एसएलपी वापस लेने का आग्रह किया गया। अदालत ने आग्रह स्वीकार किया और एसएलपी खारिज कर दी।
अब जरा पीछे का सीन समझिएः यह मामला उस समय गरम हुआ था, जब आदिवासी जमीन पर कथित तौर पर काफी साल से रह रहे गैर-आदिवासी परिवारों के 12 मकानों को तोड़ा गया। मकान टूटा तो विवाद गहराया, विवाद बढ़ा तो मामला कोर्ट पहुंचा और फिर कागजों की ऐसी परत खुलने लगी कि जमीन से ज्यादा कहानी दस्तावेजों की हो गयी।
झारखंड हाईकोर्ट ने भी मामले में काफी सख्त रुख अपनाया। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि महादेव उरांव ने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर पहले आदेश हासिल किया था। और अदालत ने 22 अक्टूबर 2024 को पारित आदेश को शून्य घोषित करते हुए कानूनी रूप से प्रभावहीन मान लिया।
इसके साथ ही महादेव उरांव पर 12 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। यानी मामले से जुड़े 12 प्रभावित पक्षों को एक-एक लाख रुपये। अब इहां भी गणित देखिए। 12 आदमी × 1 लाख = 12 लाख। अब झरखंड का बच्चा भी बोलेगा कि गणित तो साफ है बाबू, बस कहानी बहुत उलझल है।
अदालत ने कहा-तथ्य छिपाना मजाकः अदालत ने साफ तौर पर नाराजगी जताई कि कोर्ट से कोई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना गंभीर मामला है। और सच कहें तो कोर्ट में मामला जमीन का हो या आसमान का। कागज में अगर आधा सच और आधा गायब हो तो कानून पूरा हिसाब मांगता है।
अब महादेव उरांव की एसएलपी भी सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो गयी है। यानी नीचे से हाईकोर्ट का झटका मिला, ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि भाई, ई रास्ता इधर से बंद है।
जमीन विवाद का सबसे बड़ा सबकः इस पूरे मामले का सबसे मजेदार और गंभीर पहलू यही है कि जमीन पर कब्जा कौन करेगा, यह तय करने से पहले यह देखना जरूरी है कि कागज में कब्जा किसका है, पैसा किसने लिया, जमीन किसने बेची और अदालत को बताया क्या गया। क्योंकि कोर्ट में सिर्फ कहानी लेकर जाइएगा तो जज साहब कहानी नहीं, कागज मांगेंगे।
तो रांची वालों के लिए आज का कानूनी ज्ञान बस इतना कि जमीन का कागज संभाल के रखिए, तथ्य पूरा बताइए और कोर्ट को कहानी सुनाने से पहले दस्तावेज जरूर देख लीजिए। काहे कि जमीन का झगड़ा खेत में शुरू हो सकता है, लेकिन जब कोर्ट पहुंच गया ना बाबू तो फिर हल-बैल नहीं, धारा और दस्तावेज चलता है।
- झारखंड में JPSC का गजब खेल: परीक्षा रद्द करनी है, पर फैसला लेने वाला आयोग ही चौपट!
- JPSC-JSSC छात्र आंदोलन: PT रद्द, CGL और CBI जांच पर पेंच
- खूंटी में अंतिम संस्कार के 6 दिन बाद घर जिंदा लौटा मृत युवक!










