
रांची दर्पण डेस्क। मध्य प्रदेश के बरगी बांध में हाल ही में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे देश में जल-पर्यटन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस घटना के बाद भी झारखंड की राजधानी रांची और आसपास के प्रमुख डैम धुर्वा और पतरातू डैम की सुरक्षा व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आ रहा। यहां बढ़ती सैलानियों की भीड़ के बीच सुरक्षा इंतजाम अब भी सीमित और आंशिक हैं, जिससे किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
पर्यटन का विस्तार, सुरक्षा का अभावः पतरातू डैम स्थित लेक रिसॉर्ट को झारखंड पर्यटन विभाग ने एक आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया है। यहां प्रतिदिन सैकड़ों पर्यटक पहुंचते हैं और मोटर बोट व नाव की सवारी का आनंद लेते हैं। वर्तमान में यहां करीब दो दर्जन मोटर बोट और चार दर्जन नाव संचालित हो रही हैं। इनका संचालन स्थानीय नाविकों द्वारा किया जाता है। जिन्हें गोवा, कोडरमा और रांची में विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया है।
इसके बावजूद इतने बड़े और व्यस्त पर्यटन स्थल पर अब तक राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) की स्थायी तैनाती नहीं होना चिंता का विषय है। किसी भी बड़े हादसे की स्थिति में राहत और बचाव पूरी तरह स्थानीय नाविकों और सीमित संसाधनों पर निर्भर है।
धुर्वा डैम में नई शुरुआत, पुरानी चिंताएं: वर्ष 2025 से धुर्वा डैम में भी बोटिंग की शुरुआत हुई है। यहां करीब एक दर्जन मोटर बोट और नावें संचालित हो रही हैं, जिन पर प्रतिदिन दर्जनों लोग सैर करते हैं। लेकिन सुरक्षा के लिहाज से यहां भी वही हालात हैं। न तो पर्याप्त लाइफ जैकेट की अनिवार्यता का कड़ाई से पालन होता है और न ही आपातकालीन प्रतिक्रिया की मजबूत व्यवस्था दिखती है।
नाविकों की सतर्कता ही सहाराः पतरातू के विस्थापित नाविक संघ के सदस्यों का कहना है कि वे हर संभावित खतरे से निपटने के लिए सतर्क रहते हैं और सैलानियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश करते हैं। आपात स्थिति में तत्काल बचाव कार्य के लिए वे प्रशिक्षित हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल स्थानीय स्तर की तैयारी बड़े हादसों से निपटने के लिए पर्याप्त है?
पुराना हादसा, नई चेतावनीः रांची के बड़ा तालाब में वर्ष 2014 में हुए नाव हादसे को भुलाया नहीं जा सकता, जिसमें क्षमता से अधिक सवारियों के कारण नाव पलटने से तीन लोगों की मौत हो गई थी। उस समय भी लाइफ जैकेट का उपयोग सीमित था। इस घटना में तत्कालीन पर्यटन सचिव स्वर्गीय सजल चक्रवर्ती भी सवार थे। हालांकि स्थानीय गोताखोरों और मछुआरों की तत्परता से 11 लोगों की जान बचा ली गई थी।
क्या सबक लिया गया? बरगी बांध हादसे और रांची के पुराने अनुभव यह संकेत देते हैं कि केवल पर्यटन को बढ़ावा देना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन, नियमित निरीक्षण, लाइफ जैकेट की अनिवार्यता और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की तैनाती जरूरी है।
हादसे का इंतजार या सुधार की पहल? धुर्वा और पतरातू डैम में बढ़ते पर्यटन के बीच सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लापरवाही भविष्य में किसी बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। सरकार और प्रशासन के लिए यह समय है कि वे चेत जाएं और सुरक्षा को प्राथमिकता दें। ताकि पर्यटन आनंद का माध्यम बने, खतरे का नहीं।
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