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झारखंड में JPSC का गजब खेल: परीक्षा रद्द करनी है, पर फैसला लेने वाला आयोग ही चौपट!

14वीं सिविल सेवा परीक्षा विवाद के बीच JPSC के तीन सदस्यों के इस्तीफे, नौ भर्ती परीक्षाएं अगले आदेश तक स्थगित; छात्र CBI जांच की मांग पर कायम

राँची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़)। झारखंड की प्रतियोगी परीक्षाओं (JPSC) का हाल इन दिनों उस सरकारी बस जैसा हो गया है, जिसका टिकट तो मिल जाता है, लेकिन बस कब चलेगी, इसका जवाब कंडक्टर से लेकर परिवहन विभाग तक किसी के पास नहीं होता।

राज्य में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा अब सिर्फ ज्ञान, मेहनत और तैयारी का सवाल नहीं रह गई है। इसमें धैर्य, इंतजार और सरकारी फैसलों को समझने की विशेष योग्यता भी जरूरी हो गई है।

ताजा मामला झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा से जुड़ा है। सरकार परीक्षा को रद्द करने पर सहमत बताई जा रही है, लेकिन व्यवस्था के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा की किताब में भी नहीं मिलेगा। जिस आयोग को परीक्षा रद्द करने का फैसला लेना है, उसके पास फिलहाल अध्यक्ष और सदस्य ही नहीं हैं!

यानी परीक्षा रद्द करने की तैयारी पूरी है, फैसला लेने वाला मंच अधूरा है और अभ्यर्थी बीच में खड़े होकर अगली तारीख का इंतजार कर रहे हैं। झारखंड में सरकारी प्रक्रिया का यह नया संस्करण कुछ यूं समझिए कि पहले तारीख तय होती है, फिर परीक्षा टलती है और अंत में उसे रद्द करने के लिए बैठक की तारीख खोजी जाती है।

नौ परीक्षाओं पर लगा अनिश्चितकालीन विरामः परीक्षा विवाद और आयोग के भीतर पैदा हुए संकट का असर सिर्फ एक परीक्षा पर नहीं पड़ा। सरकार के निर्देश के बाद JPSC ने निर्धारित कई परीक्षाओं को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया।

इनमें 14वीं सिविल सेवा मुख्य परीक्षा-2025, सिविल सेवा की बैकलॉग परीक्षाएं, सिविल जज जूनियर डिवीजन लिखित परीक्षा, APP की नियमित और बैकलॉग परीक्षा, तथा फैक्ट्री इंस्पेक्टर, प्रोजेक्ट मैनेजर और बॉयलर इंस्पेक्टर जैसी परीक्षाएं शामिल हैं।

यानी अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा कैलेंडर अब कैलेंडर कम और संग्रहालय में रखी कोई ऐतिहासिक वस्तु ज्यादा नजर आने लगा है। जिस तारीख को कभी परीक्षा होनी थी, अब उसी तारीख को अभ्यर्थी शायद यह पता करने में व्यस्त होंगे कि अगली तारीख कब आएगी।

आयोग में इस्तीफों की ऐसी रफ्तार कि परीक्षा कैलेंडर पीछे छूट गयाः परीक्षा विवाद और छात्र आंदोलन के बीच JPSC के अध्यक्ष तथा सदस्यों के इस्तीफों ने आयोग की कार्यप्रणाली को और पेचीदा बना दिया। अध्यक्ष समेत सदस्यों के पद खाली होने के बाद आयोग के सामने नियमित प्रशासनिक और परीक्षा संबंधी निर्णय लेने की चुनौती खड़ी हो गई।

व्यंग्यात्मक स्थिति यह है कि जिस संस्थान को हजारों युवाओं के भविष्य की दिशा तय करनी थी, वही फिलहाल अपने भविष्य की प्रशासनिक दिशा खोज रहा है। छात्रों के लिए सवाल सीधा है कि परीक्षा कब होगी? सरकार के लिए सवाल है कि परीक्षा रद्द कब होगी? और आयोग के लिए सबसे बड़ा सवाल शायद यह है कि निर्णय लेने के लिए बैठक में बैठेगा कौन?

हितों के टकराव पर सदस्य ने खुद को किया अलगः इस पूरे विवाद में आयोग की तत्कालीन सदस्य डॉ. अनिमा हांसदा का मामला भी चर्चा में आया। उनकी पुत्री के परीक्षा में अभ्यर्थी होने के कारण उन्होंने परीक्षा प्रक्रिया से स्वयं को अलग रखने का निर्णय लिया था।

लोक प्रशासन में हितों के टकराव से बचने की यह पहल अपने आप में महत्वपूर्ण है। लेकिन विडंबना देखिए कि जहां एक सदस्य ने संभावित सवालों से बचने के लिए खुद को प्रक्रिया से अलग कर लिया, वहीं बाद की घटनाओं ने आयोग के अस्तित्व और निर्णय-प्रक्रिया पर ही बड़े सवाल खड़े कर दिए।

छात्रों का तर्क है कि परीक्षा जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में पारदर्शिता केवल कागज पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था में दिखाई देनी चाहिए। आखिर प्रतियोगी परीक्षा में अभ्यर्थी अपनी पूरी जिंदगी की मेहनत लगाता है, उसे बदले में कम-से-कम एक ऐसी व्यवस्था तो मिलनी चाहिए, जिस पर वह भरोसा कर सके।

JSSC-CGL विवाद ने आंदोलन को और धार दीः झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर असंतोष केवल JPSC तक सीमित नहीं है। JSSC-CGL परीक्षा को लेकर भी अभ्यर्थियों के बीच गंभीर सवाल और नाराजगी सामने आई है।

सरकार की ओर से यह कहा गया कि आंदोलनकारी छात्रों की बड़ी संख्या में मांगें स्वीकार की गई हैं और विभिन्न मामलों की जांच CID तथा ED जैसी एजेंसियों के स्तर पर चल रही है। दूसरी ओर आंदोलनकारी छात्र CBI जांच की मांग पर अड़े रहे।

यही वह बिंदु है जहां सरकारी बयान और छात्रों का भरोसा आमने-सामने दिखाई देता है। सरकार कहती है कि काफी मांगें मान ली गईं। छात्र कहते हैं कि सबसे बड़ी मांग अभी बाकी है।

लोकतंत्र में दोनों पक्षों के बीच संवाद की गुंजाइश रहती है, लेकिन परीक्षा व्यवस्था में भरोसा टूट जाए तो केवल सरकारी आदेश से उसे वापस बनाना आसान नहीं होता।

छात्र पूछ रहे हैं कि हम परीक्षा दें या तारीख’ की तैयारी करें? प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या सिर्फ परीक्षा का स्थगन नहीं है। समस्या यह है कि उन्हें अपनी तैयारी, उम्र, आर्थिक स्थिति और भविष्य की योजनाओं को बार-बार बदलना पड़ता है।

एक परीक्षा की तैयारी में महीनों और वर्षों का समय लगाने वाला अभ्यर्थी जब परीक्षा की तारीख बदलते देखता है, तो उसका पूरा अध्ययन चक्र प्रभावित होता है। कभी पाठ्यक्रम के अनुसार तैयारी करनी है, कभी संभावित तारीख के अनुसार रणनीति बदलनी है और कभी यह पता लगाना है कि परीक्षा होगी भी या नहीं।

ऐसे में झारखंड की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही बन गया है कि यहां अभ्यर्थी परीक्षा पास करने की तैयारी कम और परीक्षा टलने की खबर सुनने के लिए मानसिक रूप से ज्यादा तैयार हो रहे हैं।

अब असली परीक्षा सरकार की हैः JPSC का मौजूदा संकट केवल एक परीक्षा के रद्द या स्थगित होने का मामला नहीं है। यह उस प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा भी है, जिसके भरोसे हजारों युवा अपने करियर की योजना बनाते हैं।

सरकार के सामने अब तीन तत्काल चुनौतियां हैं। पहली, आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति कर संस्थागत निर्णय-प्रक्रिया को सामान्य करना। दूसरी, 14वीं सिविल सेवा परीक्षा सहित स्थगित परीक्षाओं पर स्पष्ट और विश्वसनीय रोडमैप देना। तीसरी, परीक्षा विवादों की जांच को ऐसी पारदर्शिता देना जिससे अभ्यर्थियों का भरोसा फिर कायम हो सके।

क्योंकि बेरोजगार युवा अनिश्चितता में अनंत काल तक नहीं बैठ सकता। उसके सामने उम्र की सीमा है, आर्थिक दबाव है और जीवन का समय है, जिसे कोई सरकारी अधिसूचना वापस नहीं कर सकती।

फिलहाल झारखंड की परीक्षा व्यवस्था का सबसे सटीक व्यंग्य यही है कि आयोग को परीक्षा करानी थी, आयोग ही संकट में है। परीक्षा की तारीख आई, परीक्षा टल गई। परीक्षा रद्द करनी है, लेकिन रद्द करने वाला आयोग अधूरा है। और अभ्यर्थी?

वह अब भी किताब खोले बैठा है, शायद अगली तारीख के इंतजार में। लेकिन एक बात जरूर तय है कि झारखंड में प्रतियोगी परीक्षा पास करने से पहले अभ्यर्थी को स्थगित, रद्द, पुनर्निर्धारित और अगली सूचना तक जैसे शब्दों का अर्थ जरूर आ जाना चाहिए।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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