कांके अंचल का गणित: 25 से 37, फिर 62 डिसमिल और रसीद अब भी 2.82 एकड़ की!

कांके अंचल में बिकी जमीन पर भी रसीद जारी। झारभूमि पोर्टल के आंकड़ों ने बढ़ाए राजस्व गड़बड़ी के सवाल।

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची के कांके अंचल अंतर्गत नेवरी मौजा का बहुचर्चित 25 बनाम 37 डिसमिल मामला अब एक और चौंकाने वाले खुलासे के साथ सामने आया है। पहले जहां 25 डिसमिल जमीन के 37 डिसमिल बन जाने की कहानी ने राजस्व तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा किया था, वहीं अब सामने आए नए तथ्यों ने इस पूरे प्रकरण को जमीन के जादुई गणित का एक बड़ा केस बना दिया है।

ताज़ा दस्तावेज़ों और ऑनलाइन रिकॉर्ड के विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि जिस मूल रैयत के नाम खतियान दर्ज है, उसके नाम पर आज भी करीब 2.82 एकड़ भूमि की रसीद लगातार कट रही है। वर्ष 2010 से पहले भी और 2025-26 तक भी। यह वही अवधि है, जिसके दौरान संबंधित भूमि के कुछ हिस्सों की बिक्री हो चुकी बताई जाती है। इसके बावजूद न तो कुल रकबे में कोई कमी दिखाई देती है और न ही रसीद निर्गमन पर कोई प्रभाव।

कागजों में ‘पुनर्जन्म’ लेती जमीन? विशेष रूप से प्लॉट संख्या 1335 का मामला और भी दिलचस्प है। खतियान में दर्ज रकबा 25 डिसमिल।  रिकॉर्ड में दिखा रकबा37 डिसमिल  और और अब रसीद गणना में प्रभाव 62 डिसमिल। यह स्थिति संकेत देती है कि जमीन का वास्तविक अस्तित्व भले स्थिर हो, लेकिन कागजों में उसका विस्तार जारी है।

ऐसे में सवाल उठता है कि  क्या यह मात्र तकनीकी त्रुटि है?  या फिर अभिलेखीय हेरफेर का सुनियोजित उदाहरण?

झारभूमि पोर्टल पारदर्शिता या परत-दर-परत विरोधाभास? डिजिटल प्लेटफॉर्म झारभूमि पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़े इस पूरे विवाद को और जटिल बना देते हैं। 2010 से पहले भी 2.82 एकड़ की रसीद। 2025-26 तक भी वही रकबा। बीच में हुई बिक्री का कोई असर नहीं।

यह स्थिति दर्शाती है कि या तो डेटा अपडेट नहीं हुआ या फिर अपडेट होने के बावजूद सिस्टम ने पुराने और नए दोनों रिकॉर्ड को समानांतर रूप से जीवित रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की विसंगति केवल गहन अभिलेखीय ऑडिट से ही स्पष्ट हो सकती है।

राजस्व व्यवस्था पर बड़ा सवालः यह मामला अब केवल एक प्लॉट या एक व्यक्ति का नहीं रह गया है। अब सीधे-सीधे सवाल उठाता है कि क्या एक ही जमीन पर दोहरी/तीहरी रसीद संभव है? क्या राजस्व अभिलेखों में बदलाव बिना वैध आधार के किया जा सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण क्या सिस्टम में ऐसी खामियां हैं, जिनका लाभ उठाकर जमीन कागजों में बढ़ाई जा सकती है?

पूर्व में भी रांची में फर्जी जमाबंदी और अभिलेखीय गड़बड़ियों के मामले सामने आते रहे हैं, जहां जांच के बाद गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई थीं।

यथार्थ बना एक व्यंग्यः नेवरी मौजा का यह प्रकरण अब एक व्यंग्यात्मक लेकिन गंभीर उदाहरण बन चुका है। जहां खेतों में फसल नहीं, बल्कि फाइलों में जमीन उग रही है। जहां रकबा घटने के बजाय बढ़ता है और जिम्मेदारी तय होने के बजाय लंबित हो जाती है। अगर यही गणित स्कूलों में पढ़ा दिया जाए तो शायद बच्चे भी पूछ बैठे कि सर, जमीन घटती कब है?

जांच, कार्रवाई या फिर इंतजार? इस मामले की शिकायत अब उच्च स्तर तक पहुंच चुकी है और इसे राजस्व विभाग को जांच के लिए भेजा गया है, जिससे आगे कार्रवाई की उम्मीद जताई जा रही है।

लेकिन बड़ा सवाल अभी भी कायम है कि क्या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह लंबित रह जाएगा या फिर यह एक ऐसा केस बनेगा, जहां राजस्व व्यवस्था की परतें खुलेंगी और जवाबदेही तय होगी?

फिलहाल जमीन कम, सवाल ज्यादाः नेवरी मौजा की मौजूदा स्थिति को अगर एक लाइन में समझें तो जमीन स्थिर है, लेकिन कागज गतिशील हैं। रकबा तय है, लेकिन आंकड़े बदलते रहते हैं और सच… अब भी जांच के इंतजार में है।

अब देखना यह है कि यह जमीन का गणित सुधरता है या फिर आने वाले समय में यह मामला झारखंड के राजस्व तंत्र का एक प्रतीकात्मक उदाहरण बनकर सामने आता है।

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