67 साल पुराना सौदा रद्द: आदिवासी जमीन संरक्षण पर रांची हाइकोर्ट का बड़ा फैसला

“रांची हाइकोर्ट का यह फैसला न केवल एक पुराने विवाद का अंत है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि कानून की मूल भावना के खिलाफ जाकर किए गए फैसले समय की कसौटी पर टिक नहीं सकते। आदिवासी जमीन की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि न्याय केवल वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत की गलतियों को सुधारने का भी माध्यम है…
रांची दर्पण डेस्क। रांची हाइकोर्ट ने आदिवासी जमीन के संरक्षण को लेकर एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए 67 साल पुराने जमीन सौदे को अवैध करार दिया है। बूटी क्षेत्र की 2.90 एकड़ जमीन से जुड़े इस बहुचर्चित मामले में अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यदि किसी सौदे की बुनियाद ही कानून के खिलाफ हो, तो उस पर आधारित पूरा दावा स्वतः समाप्त हो जाता है।
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकल पीठ ने मुंजाल परिवार की दो रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम का मूल उद्देश्य आदिवासी जमीन की रक्षा करना है, और इस उद्देश्य के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ स्वीकार्य नहीं हो सकती।
क्या है पूरा मामला? यह विवाद रांची के बूटी स्थित खाता संख्या 79 के प्लॉट संख्या 1947, 1948 और 1949 की कुल 2.90 एकड़ जमीन से जुड़ा है। मुंजाल परिवार का दावा था कि उनके पूर्वज ने 2 दिसंबर 1959 को यह जमीन वैध रूप से खरीदी थी और कई पुराने न्यायिक व राजस्व आदेश भी उनके पक्ष में रहे हैं।
वहीं राज्य सरकार और पाहन परिवार ने अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा कि जमीन मूल रूप से आदिवासी रैयत बिप्ता पाहन के नाम दर्ज थी। उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और स्थानीय जांच रिपोर्टों के अनुसार आज भी जमीन पर पाहन परिवार का वास्तविक कब्जा है।
1959 की अनुमति पर उठा सवालः मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने 1959 के उस आवेदन और आदेश की गहराई से जांच की, जिसके आधार पर तत्कालीन उपायुक्त ने जमीन बिक्री की अनुमति दी थी। आवेदन में उल्लेख था कि जमीन बेचकर गिरवी रखी धान की जमीन छुड़ानी है और बैल खरीदने हैं।
अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सीएनटी एक्ट की धारा 49 के तहत आदिवासी जमीन के हस्तांतरण की अनुमति केवल विशेष और न्यायसंगत उद्देश्यों के लिए ही दी जा सकती है। बैल खरीदना या गिरवी छुड़ाना इस श्रेणी में नहीं आता।
‘नींव अवैध तो इमारत भी ढहेगी’ अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि जब किसी दावे की बुनियाद ही अवैध हो तो उस पर आधारित पूरी संरचना स्वतः ढह जाती है।
चूंकि मुंजाल परिवार का पूरा दावा 13 नवंबर 1959 के उसी आदेश पर आधारित था, जिसे अदालत ने अवैध ठहरा दिया, इसलिए बाद के सभी दावों पर अलग से विचार करने की आवश्यकता नहीं रही।
सरकारी आदेश का आंशिक निरस्तीकरणः हालांकि अदालत ने 17 फरवरी 2021 के सरकारी आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें उपायुक्त और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) को आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलीय प्राधिकारी के रूप में राजस्व मंत्री का अधिकार क्षेत्र सीमित है और वे आपराधिक जांच शुरू करने का निर्देश नहीं दे सकते।
क्या है इस फैसले का व्यापक असर? यह फैसला सिर्फ एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे झारखंड में आदिवासी जमीन से जुड़े मामलों के लिए एक मजबूत नजीर बन सकता है। अदालत का यह रुख संकेत देता है कि सीएनटी एक्ट के प्रावधानों की अनदेखी कर किए गए पुराने सौदों की भी अब न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं को अधिक सतर्क रहने का संदेश देता है। साथ ही यह आदिवासी समुदाय के भूमि अधिकारों की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।










