रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के सुखदेवनगर थाना क्षेत्र स्थित रांची पहाड़ी मंदिर क्षेत्र में चहारदीवारी निर्माण को लेकर उपजा विवाद अब सिर्फ निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मामला धार्मिक आस्था, आदिवासी-सांस्कृतिक पहचान, प्रशासनिक समन्वय की कमी और राजनीतिक संवेदनहीनता का प्रतीक बनता जा रहा है।
बीते दिन हुए हिंसक झड़प में पहाड़ी मंदिर समिति के सदस्य राहुल तिवारी गंभीर रूप से घायल हो गये, जबकि दो अन्य लोगों को भी चोटें आयीं। घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव का माहौल है और पुलिस दोनों पक्षों की प्राथमिकी के आधार पर जांच में जुटी है।
घटना उस समय हुई, जब पर्यटन विभाग की इंजीनियरिंग विंग की ओर से रांची पहाड़ी क्षेत्र में चहारदीवारी निर्माण कराया जा रहा था। आरोप है कि नई दीवार पुरानी चहारदीवारी से लगभग तीन से चार फीट अंदर खड़ी की जा रही थी।
इस पर पहाड़ी मंदिर विकास समिति के सदस्यों ने सवाल उठाया कि आखिर वर्षों पुरानी सीमा को बदलने का अधिकार किसने दिया और किस प्रशासनिक आदेश के तहत यह निर्माण हो रहा है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार समिति के सदस्य निर्माण स्थल पर पहुंचे और काम रोकने की मांग की। उनका कहना था कि जब तक उपायुक्त और अनुमंडल पदाधिकारी स्तर पर स्पष्ट निर्णय नहीं हो जाता, तब तक निर्माण नहीं होना चाहिए।
इसी दौरान केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंचे और दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस शुरू हो गयी। देखते ही देखते विवाद हिंसक हो गया।
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि लोहे की रॉड से राहुल तिवारी पर हमला किया गया, जिससे रॉड का नुकीला हिस्सा उनकी आंख के नीचे जा घुसा। गंभीर हालत में उन्हें सेवा सदन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज आइसीयू में चल रहा है। बीच-बचाव करने पहुंचे जीतेंद्र प्रसाद और राजकुमार शर्मा भी हमले में घायल हो गये। पुलिस ने अस्पताल पहुंचकर दोनों घायलों का बयान दर्ज किया है।
दूसरी ओर केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने आरोप लगाया कि स्थानीय लोगों ने सिर्फ इतना आग्रह किया था कि चहारदीवारी को थोड़ा पीछे हटाकर बनाया जाये ताकि सरहुल, सावन और अन्य अवसरों पर श्रद्धालुओं तथा आदिवासी समुदाय के लोगों की आवाजाही बाधित न हो। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दूसरे पक्ष द्वारा जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिससे माहौल और बिगड़ गया।
विवाद की जड़ में क्या है? रांची पहाड़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां एक ओर प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर है तो दूसरी ओर सरना स्थल भी मौजूद है, जहां आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजा से जुड़े पर्व-त्योहार मनाता है। ऐसे में भूमि की सीमांकन रेखा, रास्ते और सार्वजनिक उपयोग को लेकर वर्षों से अनौपचारिक सहमति बनी हुई थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन द्वारा निर्माण कार्य शुरू करने से पहले दोनों पक्षों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के साथ लिखित सहमति और स्पष्ट नक्शा सार्वजनिक नहीं किया गया। यही अस्पष्टता अब हिंसक टकराव में बदल गयी है।
प्रशासन पर उठ रहे सवालः इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है। यदि निर्माण कार्य पर्यटन विभाग की निगरानी में हो रहा था, तो क्या सीमांकन का आधिकारिक सर्वे कराया गया था? क्या स्थानीय समुदायों की सहमति ली गयी थी? और यदि पहले बैठक में सहमति बनी थी तो फिर मौके पर तनाव की स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?
ठेकेदार विनोद यादव ने दावा किया है कि स्थानीय बैठक में तीन से चार फीट अंदर से दीवार बनाने पर सहमति बनी थी, क्योंकि वहां सरना स्थल मौजूद है। हालांकि पहाड़ी मंदिर समिति इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रही है। इससे स्पष्ट है कि मौखिक सहमति और आधिकारिक दस्तावेजों के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
सामाजिक सौहार्द के लिए चेतावनीः रांची जैसे बहुसांस्कृतिक शहर में धार्मिक और आदिवासी आस्था से जुड़े मुद्दे बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक देरी या संवादहीनता छोटी घटनाओं को भी बड़े सामाजिक तनाव में बदल सकती है।
फिलहाल पुलिस दोनों पक्षों के आरोपों की जांच कर रही है, लेकिन स्थानीय लोगों की मांग है कि जिला प्रशासन तत्काल संयुक्त बैठक बुलाकर सीमांकन, रास्ते और निर्माण की स्थिति को स्पष्ट करे।
घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि विकास कार्य केवल ईंट और सीमेंट का मामला नहीं होता, बल्कि उससे जुड़ी स्थानीय भावनाओं, परंपराओं और सामाजिक संतुलन को समझना भी उतना ही जरूरी है।










