DC साहब, बिना अनुमति इस CNT खेत में अचानक कैसे उग आए गैरआदिवासी घर?

रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के कांके अंचल स्थित मौजा-नेवरी की एक जमीन इन दिनों कई गंभीर सवालों के केंद्र में है। सवाल सिर्फ एक प्लॉट (CNT खेत) पर कथित अवैध बसावट का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर उठ रहा है, जिसके बीच आदिवासी प्रकृति की जमीन पर धीरे-धीरे निर्माण होते गए, गैर-आदिवासी परिवार बसते गए और प्रशासनिक मशीनरी कथित तौर पर मूकदर्शक बनी रही।
मामला खाता संख्या-21 और प्लॉट संख्या-1338 से जुड़ा है। यह भूमि अभिलेखों, खतियान और रजिस्टर-II में खेदुआ उरांव, पिता-कुवा उरांव के नाम दर्ज है। यह जमीन आदिवासी प्रकृति की है और पिछले कुछ वर्षों में कथित जमीन दलालों ने एकरारनामा और निजी सौदों के जरिए वहां गैर-आदिवासी लोगों को बसाना शुरू कर दिया। अब यही मामला एक नए विवाद का कारण बन गया है।
पहले खेत था, अब अचानक घर उग आए! स्थानीय स्तर पर उपलब्ध तस्वीरें और दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि जिस इलाके में कभी आदिवासी प्रकृति खुला खेत था, वहां अब वहां अचानक धान की जगह घर उगे दिखाई देने लगे हैं। इस प्लॉट के आगे स्थित उसकी निजी जेनरल प्रकृति की जमीन की चहारदीवारी कई बार तोड़ी गई और वहां से जबरन रास्ता बनाने की कोशिश की जा रही है। जबकि जिस रास्ते को लेकर विवाद है, वह पूर्व से कभी अस्तित्व में नहीं था।
इस संबंध में बीआइटी मेसरा थाना पुलिस को लिखित शिकायत दी गई थी और मामले से वरीय पुलिस अधीक्षक रांची को भी अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इसी निष्क्रियता को लेकर अब प्रशासनिक भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
CNT Act के बीच कैसे खड़े हो गए मकान? यही वह प्रश्न है जो पूरे मामले को साधारण भूमि विवाद से अलग बनाता है। झारखंड में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act), 1908 आदिवासी भूमि संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण कानून माना जाता है। इस कानून के तहत अनुसूचित जनजाति की जमीन को गैर-आदिवासी को हस्तांतरित करने पर सख्त कानूनी प्रतिबंध लागू हैं।
भूमि कानून विशेषज्ञों के अनुसार केवल एकरारनामा या निजी लिखित समझौते से CNT जमीन का वैध हस्तांतरण नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में प्रशासनिक अनुमति और वैधानिक प्रक्रिया आवश्यक होती है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं तो यह मामला केवल अवैध कब्जे का नहीं बल्कि CNT Act उल्लंघन, फर्जीवाड़ा और राजस्व तंत्र की संभावित विफलता का भी हो सकता है।
राजधानी के आसपास क्यों बढ़ रहे ऐसे विवाद? रांची के विस्तार और जमीन की बढ़ती कीमतों के साथ कांके, नेवरी, पिठोरिया, बूटी मोड़ और आसपास के इलाकों में जमीन कारोबार तेजी से बढ़ा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई जगहों पर आदिवासी प्रकृति की जमीनों में सादा एग्रीमेंट, एकरारनामा, पावर ऑफ अटॉर्नी और अनौपचारिक सौदों के जरिए कब्जे और निर्माण के आरोप पहले भी लगते रहे हैं।
हालांकि समय-समय पर प्रशासनिक कार्रवाई और हाईकोर्ट के आदेशों के बाद कुछ अवैध निर्माण हटाए भी गए, लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसे विवाद थमते नहीं दिख रहे।
शिकायत में क्या मांग की गई? उपायुक्त (DC) और वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP रांची) को भेजे गए आवेदन में शिकायतकर्ता ने प्लॉट संख्या-1338 की राजस्व एवं कानूनी जांच, CNT Act उल्लंघन की जांच, कथित जमीन दलालों की पहचान, अवैध बसावट की जांच, निजी जमीन की सुरक्षा, चहारदीवारी तोड़ने वालों पर प्राथमिकी, जबरन रास्ता निर्माण पर रोक और मजिस्ट्रेट जांच की मांग की है।
जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं? मामले में सबसे गंभीर सवाल यही उभर रहा है कि यदि जमीन पर अचानक निर्माण हुआ, लोग बस गए और विवाद बढ़ता गया तो क्या स्थानीय प्रशासन और पुलिस को इसकी जानकारी नहीं थी? और यदि जानकारी थी, तो समय रहते हस्तक्षेप क्यों नहीं किया गया?
फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन नेवरी का यह मामला एक बार फिर यह संकेत जरूर दे रहा है कि राजधानी के आसपास जमीन, कानून और कब्जे की लड़ाई अब सिर्फ राजस्व विवाद नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक तनाव और प्रशासनिक जवाबदेही का भी बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।










