रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के कांके थाना क्षेत्र से सामने आया हाईटेक जॉब फ्रॉड का मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि बेरोजगारी, डिजिटल धोखाधड़ी और कॉरपोरेट ब्रांड के दुरुपयोग की खतरनाक सच्चाई को उजागर करता है।
रिवर डेल सिटी आइआइसीएम के समीप रहने वाले देवाशीष मिश्रा की गिरफ्तारी ने यह संकेत दिया है कि अब नौकरी के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह पहले से कहीं अधिक संगठित और तकनीकी रूप से सक्षम हो चुके हैं।
पुलिस के अनुसार आरोपी देवाशीष मिश्रा युवाओं को सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों में नौकरी दिलाने का झांसा देता था। इसके लिए वह सीसीएल, मेकॉन और एनटीपीसी जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों के नाम से फर्जी ईमेल आईडी बनाकर उम्मीदवारों को मेल भेजता था।
ईमेल में नियुक्ति प्रक्रिया, इंटरव्यू और चयन की औपचारिकताओं का ऐसा जाल बुना जाता था कि बेरोजगार युवा आसानी से विश्वास कर बैठते थे।
कांके थाना प्रभारी साक्षी जमुआर और अनुसंधानकर्ता कफील अहमद के अनुसार शिकायतकर्ता सुदर्शन चौबे द्वारा लिखित शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद पुलिस ने देवाशीष मिश्रा को पूछताछ के लिए बुलाया।
पूछताछ के दौरान आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। पुलिस का दावा है कि आरोपी नौकरी की 100 प्रतिशत गारंटी देकर अभ्यर्थियों से लाखों रुपये वसूलता था।
परिवार के खातों से चलता था पैसों का खेलः जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि आरोपी सीधे अपने बैंक खाते में रकम नहीं मंगवाता था। पुलिस के मुताबिक ठगी की राशि उसके बेटे प्रियांशु मिश्रा, पत्नी ज्योति मिश्रा और बहन वंदना मिश्रा के खातों में ट्रांसफर कराई जाती थी। यही कारण है कि प्राथमिकी में पूरे परिवार को नामजद अभियुक्त बनाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर और वित्तीय अपराधों में अब लेयरिंग तकनीक तेजी से बढ़ रही है, जिसमें अपराधी खुद को बचाने के लिए कई बैंक खातों और पारिवारिक नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। इससे जांच एजेंसियों को पैसों की वास्तविक दिशा और लाभार्थी तक पहुंचने में अधिक समय लगता है।
बेरोजगारी और भरोसे का संकटः झारखंड समेत देशभर में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों के प्रति युवाओं का आकर्षण लगातार बना हुआ है। ऐसे में CCL, NTPC और MECON जैसी कंपनियों का नाम युवाओं के बीच भरोसे का प्रतीक माना जाता है। ठग इसी भरोसे का फायदा उठाते हैं।
विश्लेषकों के अनुसार यह मामला बताता है कि नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं में डिजिटल जागरूकता की कमी अभी भी बड़ी समस्या है। कई बार उम्मीदवार फर्जी ईमेल डोमेन, संदिग्ध भुगतान मांग और बिना आधिकारिक वेबसाइट के भर्ती प्रक्रिया को पहचान नहीं पाते। नौकरी पाने की जल्दबाजी उन्हें ठगी के जाल में धकेल देती है।
कैसे काम करता है ऐसा जॉब फ्रॉड नेटवर्क? इस तरह के मामलों में आम तौर पर चार चरण होते हैं। पहला प्रतिष्ठित कंपनी के नाम का उपयोग कर फर्जी ईमेल, लेटरहेड और कॉलिंग प्रोफाइल बनाना। दूसरा जॉब ऑफर का लालच देकर सीधी नियुक्ति, गारंटीड चयन या इनसाइड रेफरेंस का दावा। प्रोसेसिंग फीस और सिक्योरिटी डिपॉजिट के रुप में मेडिकल, ट्रेनिंग, दस्तावेज सत्यापन या सिक्योरिटी के नाम पर पैसे मांगना। उसके बाद संपर्क खत्म कर रकम मिलने के बाद फोन बंद, ईमेल डिलीट और सोशल मीडिया प्रोफाइल गायब। कांके का यह मामला भी लगभग इसी पैटर्न पर आधारित बताया जा रहा है।
पुलिस की अगली कार्रवाईः केस के अनुसंधानकर्ता कफील अहमद ने बताया कि गिरोह के अन्य सदस्यों और नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है। पुलिस अब बैंक खातों के लेनदेन, डिजिटल डिवाइस और ईमेल नेटवर्क की जांच कर रही है। संभावना जताई जा रही है कि ठगी का दायरा सिर्फ रांची तक सीमित नहीं हो सकता।
युवाओं के लिए चेतावनीः यह मामला एक बड़ा संदेश भी देता है कि कोई भी प्रतिष्ठित कंपनी नौकरी के बदले निजी खाते में पैसा जमा नहीं कराती। भर्ती प्रक्रिया हमेशा आधिकारिक वेबसाइट, सत्यापित ईमेल डोमेन और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से होती है। यदि कोई व्यक्ति गारंटीड नौकरी का दावा करे और पैसे मांगे तो सतर्क हो जाना चाहिए।
रांची में सामने आया यह कथित हाईटेक जॉब रैकेट सिर्फ एक गिरफ्तारी की खबर नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक दबाव का आईना है, जहां बेरोजगारी और डिजिटल धोखाधड़ी मिलकर युवाओं के सपनों को निशाना बना रही है।










