
रांची दर्पण डेस्क। ऐतिहासिक रांची पहाड़ी मंदिर में सोमवार को प्रबंधन को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद खुलकर सामने आ गया, जब राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा अधिसूचित नई प्रबंध समिति ने विरोध और हंगामे के बीच पदभार ग्रहण कर लिया। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ मंदिर प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि ‘वीआईपी संस्कृति’ बनाम ‘समान अधिकार’ की बहस को भी तेज कर दिया है।
पूजा-अर्चना के बाद संभाली जिम्मेदारी, प्रशासन गायबः नवगठित समिति के अध्यक्ष सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति डॉ. एसएन पाठक, उपाध्यक्ष राकेश कुमार सिंह व बीएन तिवारी, तथा सचिव राकेश सिन्हा समेत अन्य पदाधिकारियों ने पहले मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना की और फिर औपचारिक रूप से प्रभार संभाल लिया।
हालांकि इस प्रक्रिया में जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारी उपायुक्त और एसडीएम की अनुपस्थिति ने पूरे घटनाक्रम को विवादित बना दिया।
सचिव राकेश सिन्हा ने स्पष्ट कहा कि प्रशासन के इंतजार में काम नहीं रोका जा सकता था, इसलिए हमने स्वतः प्रभार लिया। हमारी समिति पूरी तरह संवैधानिक है और मंदिर को नई दिशा देगी।
वैष्णो देवी मॉडल और वीआईपी संस्कृति खत्म करने का दावाः नई समिति ने मंदिर के विकास के लिए माता वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर सुविधाएं विकसित करने की घोषणा की है। सबसे बड़ा और चर्चित फैसला है वीआईपी कल्चर को खत्म करना। सचिव के मुताबिक अब हर श्रद्धालु को समान अवसर मिलेगा, किसी विशेष वर्ग को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
यह घोषणा सामाजिक रूप से लोकप्रिय तो हो सकती है, लेकिन इसके व्यावहारिक क्रियान्वयन और संभावित विरोध को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
ताले पर ताला यानि पारदर्शिता पर सवालः नई समिति के सदस्यों ने आरोप लगाया कि जब वे कार्यालय पहुंचे तो कई कमरों में ताले लगे थे। कुछ जगहों पर तो ताले के ऊपर ताले भी पाए गए। इसे उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न बताया।
पुरानी समिति का पलटवार- असंवैधानिक और न्यायालय में मामला लंबितः दूसरी ओर पुरानी पहाड़ी मंदिर विकास समिति ने इस पूरे घटनाक्रम को अवैध और असंवैधानिक करार दिया। उनका कहना है कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए किसी नई समिति को प्रभार लेने का अधिकार नहीं है। विरोध में समिति के सदस्यों ने मंदिर गेट पर धरना दिया और जमकर नारेबाजी की।
आमने-सामने टकराव, धक्का-मुक्की से बिगड़ा माहौलः स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब दोनों समितियों के सदस्य मंदिर के मुख्य द्वार पर आमने-सामने आ गए। नारेबाजी के बीच धक्का-मुक्की और तीखी नोकझोंक हुई, जिससे कुछ समय के लिए अफरातफरी का माहौल बन गया। हालांकि स्थानीय लोगों और मौजूद श्रद्धालुओं के हस्तक्षेप से स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया।
धार्मिक स्थल या प्रशासनिक सत्ता का केंद्र?यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक मंदिर प्रबंधन का विवाद नहीं, बल्कि तीन बड़े सवालों को उजागर करता है कि राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड की भूमिका और उसकी वैधानिक सीमा पर बहस तेज हो सकती है।
वहीं प्रशासनिक अधिकारियों की अनुपस्थिति और तालेबंदी जैसे आरोप इस ओर इशारा करते हैं कि अंदरूनी व्यवस्थाएं अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। नई समिति का यह कदम जनभावनाओं के अनुरूप है, लेकिन क्या यह पुराने ढांचे और प्रभावशाली वर्गों के हितों से टकराव नहीं बढ़ाएगा?
आगे क्या? अब निगाहें न्यायालय के संभावित फैसले और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। अगर विवाद लंबा खिंचता है तो इसका असर न सिर्फ मंदिर की व्यवस्थाओं पर पड़ेगा, बल्कि श्रद्धालुओं की सुविधा और धार्मिक आस्था पर भी पड़ सकता है।फिलहाल पहाड़ी मंदिर में पूजा से ज्यादा चर्चा प्रबंधन की हो रही है और यही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है।










