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कांके CO ने भूमि फर्जीवाड़ा को लेकर रांची DC-AC को किया यूं भ्रमित करने का प्रयास

“राजस्व मामलों में अधूरी जानकारी भी उतनी ही खतरनाक होती है जितनी गलत जानकारी, क्योंकि इससे निर्णय की दिशा ही बदल सकती है…”

रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के कांके अंचल से जुड़ा एक संवेदनशील मामला सामने आया है, जिसमें अंचलाधिकारी द्वारा उच्च अधिकारियों को भेजी गई रिपोर्ट की विश्वसनीयता और पूर्णता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नेवरी मौजा स्थित भूमि प्रकरण में प्रस्तुत प्रतिवेदन को लेकर यह खुलासा सामने आया है कि इसमें तथ्यों का समग्र और संतुलित प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मामले की शिकायत उपायुक्त रांची के समक्ष की गई थी, जिसे जन शिकायत कोषांग के माध्यम से संज्ञान में लिया गया। इसके पश्चात अपर समाहर्ता रांची द्वारा कांके अंचलाधिकारी से विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई थी। इसी क्रम में वर्तमान अंचलाधिकारी अमित भगत द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जो अब विवाद का केंद्र बन गई है।

सूत्रों के अनुसार उक्त रिपोर्ट में वर्ष 2022 के दौरान सृजित 12 डिसमिल की कथित जमाबंदी का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन उससे पूर्व वर्ष 2010-11 के दौरान उसी भूमि से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण जमाबंदी प्रविष्टियों विशेष रूप से 12 डिसमिल एवं 8 डिसमिल का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है।

रिपोर्ट में वर्ष 2010 के एक खरीदार के नाम 5 डिसमिल भूमि क्रय का उल्लेख किया गया है, किन्तु उसी अवधि के अन्य क्रेताओं और संबंधित प्रविष्टियों को नजरअंदाज किए जाने की बात सामने आई है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या रिपोर्ट तैयार करते समय सभी प्रासंगिक तथ्यों को शामिल किया गया।

राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी भूमि विवाद में सभी ऐतिहासिक प्रविष्टियों का क्रमवार और पूर्ण विवरण आवश्यक होता है। ऐसे में यदि कुछ तथ्यों को प्रमुखता दी जाए और अन्य को छोड़ा जाए तो इससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

इसी संदर्भ में यह भी चर्चा है कि संबंधित अवधि में अंचल स्तर पर पदस्थापित रहे तत्कालीन प्रभारी अंचलाधिकारी शीलवंत कुमार भट्ट के कार्यकाल की अवैध प्रविष्टियों का समुचित उल्लेख न किया जाना संदेह को और बढ़ाता है।

इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या उच्च अधिकारियों को भेजी गई रिपोर्ट तथ्यपरक और पूर्ण थी?  क्या महत्वपूर्ण प्रविष्टियों का उल्लेख न करना एक प्रशासनिक त्रुटि है या फिर चयनात्मक दृष्टिकोण?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिपोर्टिंग में पारदर्शिता नहीं होगी तो न्यायिक एवं प्रशासनिक निर्णय भी प्रभावित हो सकते हैं।

फिलहाल इस मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, जिस प्रकार से रिपोर्ट की प्रकृति को लेकर सवाल उठे हैं, उससे यह संभावना जताई जा रही है कि उच्च स्तर पर इस पूरे मामले की पुनः समीक्षा की जा सकती है।

 

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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