फीचर्डभ्रष्टाचार

रांची DCLR आदेश के बावजूद अवैध प्रविष्टि जारी, ACB ने PE दर्ज कर शुरु की जांच

रांची दर्पण डेस्क। रांची जिले के कांके अंचल अंतर्गत नेवरी मौजा की एक जमीन अब केवल विवाद का विषय नहीं, बल्कि राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बनकर उभरी है। यह मामला इस कारण चर्चा में है कि 25 डिसमिल भूमि को रिकॉर्ड में 37 डिसमिल के रूप में दर्शाए जाने का आरोप है और यह स्थिति आदेशों के बाद भी जस की तस बनी हुई है।

उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार इस विवादित 12 डिसमिल अतिरिक्त जमाबंदी को उप समाहर्ता भूमि सुधार (DCLR), सदर रांची ने 02 दिसंबर 2025 को निरस्त करने का स्पष्ट आदेश दिया था और अंचल अधिकारी को अभिलेखीय सुधार व अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया था।

आदेश के बाद भी कार्रवाई शून्य, उल्टा नई रसीदः सबसे गंभीर पहलू यह है कि उक्त आदेश के बावजूद न केवल अभिलेखों में सुधार नहीं हुआ, बल्कि 16 अप्रैल 2026 को उसी विवादित जमाबंदी के आधार पर वर्ष 2026-27 की नई राजस्व रसीद जारी कर दी गई।

यह तथ्य यह संकेत देता है कि या तो आदेश का अनुपालन नहीं किया गया या फिर राजस्व प्रणाली में किसी स्तर पर गंभीर प्रक्रियात्मक विफलता है। पहले भी इस प्रकार के मामलों में झारखंड उच्च न्यायालय ने दोहरी जमाबंदी पर सख्त रुख अपनाया है और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

जमाबंदी का ‘अजूबा गणित’ तकनीकी चूक या सुनियोजित गड़बड़ी? राजस्व विशेषज्ञों के अनुसार किसी भूमि का रकबा बढ़ना एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया से गुजरता है जिसमें रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज, फील्ड वेरिफिकेशन और डिजिटल एंट्री शामिल होती है।

ऐसे में 25 डिसमिल भूमि पर 37 डिसमिल की रसीद कटना एक सामान्य त्रुटि नहीं मानी जा सकती। इस तरह की स्थिति को आम तौर पर “डबल जमाबंदी” या “रिकॉर्ड मैनिपुलेशन” के रूप में देखा जाता है, जो जांच का विषय होता है।

प्रशासनिक स्तर पर उठे सवालः मामले को लेकर पहले भी जिला प्रशासन के समक्ष शिकायतें की गईं, यहां तक कि जनता दरबार में भी इस पर निर्देश दिए गए थे, फिर भी कोई ठोस सुधार सामने नहीं आया।

यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है कि आदेश के अनुपालन में देरी क्यों?  जिम्मेदारी किस अधिकारी की? क्या डिजिटल राजस्व प्रणाली में निगरानी की कमी है?

ACB की एंट्री, अब जांच के दायरे में मामलाः मामले की गंभीरता को देखते हुए अब यह भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) तक पहुंच चुका है, जहां प्रारंभिक जांच (PE) दर्ज की गई है।

राज्य में पूर्व में भी भूमि अनियमितताओं के मामलों में ACB की सक्रियता देखी गई है, जहां जांच के बाद आपराधिक कार्रवाई तक की नौबत आई है।

डिजिटल सिस्टम बनाम जमीनी सच्चाईः झारखंड में “झारभूमि” जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भूमि अभिलेखों को पारदर्शी बनाने का प्रयास किया गया है, लेकिन इस प्रकरण ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऑनलाइन डेटा पूरी तरह विश्वसनीय है? क्या बैकएंड में बदलाव की निगरानी पर्याप्त है?

एक केस, कई संकेतः यह मामला केवल एक प्लॉट तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक रूप से तीन स्तरों पर अदालती/अर्ध-न्यायिक आदेश का पालन न होना, ऑनलाइन सिस्टम में त्रुटियों की संभावना और किस स्तर पर निर्णय लिया गया, यह अब तक स्पष्ट नहीं गंभीर चिंता पैदा करता है।

अब सभी की नजर ACB की जांच पर टिकी है। यदि जांच में अनियमितता की पुष्टि होती है तो मामला प्राथमिकी (FIR), विभागीय कार्रवाई  या उच्चस्तरीय जांच  तक पहुंच सकता है।

हालांकि यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों एवं अभिलेखों पर आधारित है। मामला वर्तमान में जांचाधीन है, अतः किसी भी पक्ष पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया जा रहा है। संबंधित पक्ष का जवाब प्राप्त होने पर प्रकाशित किया जाएगा। बहरहाल जब आदेश के बाद भी रिकॉर्ड नहीं बदलता तो सवाल जमीन से ज्यादा सिस्टम पर उठता है।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.