
रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची में मॉनिटर लिजार्ड यानि विशेष प्रजाति की छिपकली तस्करी के मामले ने सनसनी फैला दी है। वन विभाग की कार्रवाई में गिरफ्तार भाजपा नेता राजीव रंजन मिश्र समेत तीन आरोपियों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। इस मामले में वन विभाग अब बड़े अंतरराज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क की जांच में जुट गया है।
जानकारी के अनुसार वन विभाग की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर शहर के एक होटल में छापेमारी कर लेक रोड निवासी राजीव रंजन मिश्र, अविनाश आनंद तथा रेडियम रोड निवासी अरुण राम को हिरासत में लिया था।
तलाशी के दौरान इनके पास से मॉनिटर लिजार्ड के शरीर के लगभग 30 अवैध हिस्से बरामद किए गए। अधिकारियों के मुताबिक इन अंगों का इस्तेमाल अंधविश्वास और तांत्रिक गतिविधियों में किया जाता है।
हत्था जोड़ी के नाम पर होता है करोड़ों का खेलः वन विभाग की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि तस्कर मॉनिटर लिजार्ड (छिपकली तस्करी) के गुप्तांगों को काटकर सुखा देते हैं। सूखने के बाद उसका आकार प्रार्थना करते हुए हाथ जैसा दिखाई देता है, जिसे बाजार में हत्था जोड़ी नामक दुर्लभ जड़ी बताकर ऊंचे दामों में बेचा जाता है। अंधविश्वास फैलाकर इसे सुख-समृद्धि, तांत्रिक क्रियाओं और धन लाभ से जोड़कर ग्राहकों को ठगा जाता है।
इसके अलावा मॉनिटर लिजार्ड की चर्बी से निकाले जाने वाले तेल को सांडा तेल बताकर यौन शक्ति बढ़ाने और जोड़ों के दर्द में लाभकारी होने का दावा किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे दावे पूरी तरह भ्रामक और अवैज्ञानिक हैं।
क्या है मॉनिटर लिजार्ड? मॉनिटर लिजार्ड छिपकली की एक बड़ी प्रजाति है, जो भारत के जंगलों, नदी किनारों, कृषि क्षेत्रों और रेगिस्तानी इलाकों में पायी जाती है। भारत में इसकी मुख्य चार प्रजातियां बंगाल मॉनिटर, येलो मॉनिटर, वॉटर मॉनिटर और डेजर्ट मॉनिटर पायी जाती हैं। इसकी लंबाई दो फीट से लेकर छह-सात फीट तक हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में इसे “विषखोपड़ा” भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसका जहर इंसानों के लिए घातक नहीं होता, लेकिन इसके काटने से संक्रमण का खतरा बना रहता है। लगातार शिकार और तस्करी के कारण इसकी संख्या तेजी से घट रही है।
वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत गंभीर अपराधः भारत में मॉनिटर लिजार्ड को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत संरक्षित श्रेणी में रखा गया है। इसका शिकार करना, पालना या इसके अंगों की खरीद-बिक्री करना गंभीर अपराध माना जाता है। दोषी पाए जाने पर सात वर्ष तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
पूर्व पीसीसीएफ (वन्य प्राणी) एलआर सिंह ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि इस तरह की तस्करी के तार विदेशों तक जुड़े हो सकते हैं। उन्होंने वन विभाग में वन्यजीव तस्करी की निगरानी के लिए अलग विशेष विंग बनाने की जरूरत बतायी। उनके अनुसार सीमित संसाधनों और बढ़ते कार्यभार के कारण वनकर्मी कई बार ऐसे संगठित रैकेट की गहराई तक नहीं पहुंच पाते।
वन विभाग अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर यह पता लगाने में जुटा है कि इस अवैध कारोबार का नेटवर्क कहां तक फैला हुआ है और इसमें और कौन-कौन लोग शामिल हैं।










