JPSC-JSSC छात्र आंदोलन: PT रद्द, CGL और CBI जांच पर पेंच
14वीं जेपीएससी पीटी और दो बैकलॉग परीक्षाएं रद्द करने पर सरकार राजी, ईडी जांच का प्रस्ताव भी; सीजीएल रद्द और सीबीआई जांच पर पेंच कायम। छात्र बोले- जब बीमारी बड़ी है तो सिर्फ थर्मामीटर बदलने से इलाज कैसे होगा?

रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची में JPSC-JSSC छात्र आंदोलन को लेकर चली मैराथन वार्ता ने झारखंड की परीक्षा व्यवस्था का एक दिलचस्प गणित सामने रख दिया। सरकार के हिसाब से 98 फीसदी मांगें मान ली गयीं, लेकिन आंदोलनकारियों के हिसाब से बची हुई 2 फीसदी मांगें ही इतनी महत्वपूर्ण हैं कि आंदोलन खत्म नहीं किया जा सकता।
स्टेट गेस्ट हाउस में सरकार और आंदोलनकारी छात्र प्रतिनिधियों के बीच लगातार तीसरे दिन हुई बातचीत भी किसी निर्णायक समझौते तक नहीं पहुंच सकी। बैठक खत्म हुई तो सरकार के मंत्रियों के चेहरे पर लगभग सब मान लिया वाली संतुष्टि थी, जबकि छात्रों के चेहरे पर अभी तो असली सवाल बाकी है वाला भाव।
नतीजा यह रहा कि सोमवार को विधानसभा घेराव का कार्यक्रम यथावत रहा। आंदोलनकारी छात्रों का दावा है कि राज्यभर से बड़ी संख्या में युवा रांची पहुंच रहे हैं और एक लाख से अधिक युवाओं के सड़क पर उतरने की संभावना है।
यानी सरकार कह रही है कि मांगें लगभग मान लीं। छात्र कह रहे हैं कि लगभग से नौकरी नहीं मिलती, परीक्षा चाहिए साफ-सुथरी। और झारखंड की परीक्षा व्यवस्था शायद दोनों को देखकर चुपचाप यही सोच रही होगी कि पहले मेरा रिजल्ट तो आने दो!
वार्ता में सरकार ने 14वीं जेपीएससी पीटी परीक्षा तथा जेपीएससी बैकलॉग 2023 और बैकलॉग 2025 परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति जतायी है। आंदोलनकारियों की ओर से इसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन छात्रों की मुख्य मांगों में सीजीएल परीक्षा को रद्द करना और पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच भी शामिल है। यहीं से वार्ता का गणित फिर उलझ जाता है।
सरकार का तर्क है कि सीजीएल परीक्षा न्यायालय के निर्देशों के तहत आयोजित हुई है, इसलिए इसे रद्द करना आसान नहीं है। मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के अनुसार परीक्षा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत हुई है और इसके कई अभ्यर्थी नौकरी तक कर रहे हैं।
छात्रों का सवाल है कि यदि परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं तो सिर्फ यह कह देने से मामला खत्म कैसे हो सकता है कि परीक्षा के बाद कुछ लोगों को नौकरी मिल चुकी है? यानी विवाद अब सिर्फ परीक्षा हुई या नहीं का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि परीक्षा कितनी पारदर्शी थी और उसकी पूरी प्रक्रिया पर भरोसा क्यों किया जाए?
ईडी को आर्थिक पहलू, सीआईडी को आपराधिक पहलूः सरकार ने टीडीपीएल एजेंसी के माध्यम से आयोजित परीक्षाओं की जांच कराने की बात कही है। प्रस्ताव के अनुसार एजेंसी द्वारा आयोजित परीक्षाओं से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच सीआईडी और आर्थिक पहलुओं की जांच प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी से करायी जायेगी।
यह प्रस्ताव इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि परीक्षा विवाद अब सिर्फ प्रश्नपत्र, परिणाम और नियुक्ति तक सीमित नहीं बताया जा रहा, बल्कि कथित आर्थिक लेन-देन के आरोप भी सामने आये हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि जांच को 90 दिनों के भीतर पूरा कराने का प्रावधान किया जायेगा।
झारखंड की नौकरशाही के लिए 90 दिन का आंकड़ा अपने आप में काफी दिलचस्प है। आम आदमी के लिए 90 दिन का मतलब तीन महीने होता है, लेकिन सरकारी जांच में कभी-कभी यह कैलेंडर की तारीख से ज्यादा एक उम्मीद की तारीख भी बन जाता है। इस बार छात्रों की नजर इसी बात पर रहेगी कि 90 दिन वास्तव में 90 दिन ही रहते हैं या सरकारी फाइलों के हिसाब से उनका कोई अलग गणित निकलता है।
सीबीआई बनाम सीआईडी, भरोसे की असली लड़ाईः छात्र पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग पर अड़े हैं। सरकार का कहना है कि सीआईडी जांच कर रही है और उसे निर्धारित समय में पूरा कराया जायेगा। इसके अलावा सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक अलग कमेटी से भी जांच कराने की बात कही गयी है।
अर्थात जांच के लिए विकल्पों की कमी नहीं है। सीआईडी है, ईडी है, रिटायर जज वाली कमेटी है और ऊपर से फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रस्ताव भी है। बस छात्रों की मांग है कि सीबीआई भी चाहिए। यहीं आंदोलन की सबसे बड़ी गांठ है। सरकार जांच कराने को तैयार है, छात्र यह तय करना चाहते हैं कि जांच कौन करे। क्योंकि परीक्षा में जब भरोसा टूट जाता है, तब सिर्फ यह बताना काफी नहीं होता कि जांच होगी; लोग यह भी पूछते हैं कि जांच करने वाले पर भरोसा क्यों किया जाए।
सीजीएल बनी वार्ता की कुंजीः पूरे विवाद में सीजीएल परीक्षा सबसे बड़ा अड़ंगा बनकर सामने आयी है। सरकार इसे रद्द करने के पक्ष में नहीं है। मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का कहना है कि परीक्षा अदालत के दिशानिर्देशों के तहत आयोजित हुई है और कई अभ्यर्थी नौकरी कर रहे हैं। वहीं छात्र परीक्षा रद्द करने और सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।
इस स्थिति में मामला कुछ ऐसा बन गया है जैसे एक तरफ सरकार कह रही हो कि परीक्षा को छूना मुश्किल है। और दूसरी तरफ छात्र कह रहे हों कि अगर व्यवस्था पर सवाल है तो परीक्षा को बचाना क्यों जरूरी है? सीजीएल को लेकर अंतिम फैसला अब आंदोलन के अगले चरण की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
जेपीएससी में इस्तीफों का दौरः उधर विवाद के बीच जेपीएससी में बड़ा घटनाक्रम हुआ है। आयोग की तीन सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्या, डॉ. अनिमा हांसदा और डॉ. जमाल अहमद ने रविवार को अपने-अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने इन इस्तीफों को स्वीकार कर लिया है। तीनों सदस्यों को सीआईडी ने पूछताछ के लिए समन भेजा था। अब पूछताछ की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। इससे पहले जेपीएससी के अध्यक्ष एल. खियांग्ते भी सीआईडी की छापेमारी के दिन अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।
अब जेपीएससी की तस्वीर ऐसी दिख रही है कि परीक्षा विवाद के सवालों के बीच आयोग के शीर्ष पदों पर बैठे लोग एक-एक कर किनारे होते जा रहे हैं और जांच एजेंसियां सवालों की सूची लेकर आगे बढ़ रही हैं।
आज अजीता भट्टाचार्या से पूछताछः सीआईडी आज सोमवार को जेपीएससी की पूर्व सदस्य डॉ. अजीता भट्टाचार्या से पूछताछ करेगी। इसके बाद मंगलवार को पूर्व सदस्य डॉ. अनिमा हांसदा और बुधवार को डॉ. जमाल अहमद से पूछताछ प्रस्तावित है। पूर्व अध्यक्ष एल. खियांग्ते से सीआईडी पहले ही कई दौर की बातचीत कर चुकी है।
अब देखना यह है कि पूछताछ की इस कड़ी से जांच को कौन-सा नया तथ्य मिलता है और क्या वे सवालों के जवाब सामने आते हैं, जिनको लेकर छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा है।
मंत्री दीपिका ने देवेंद्र महतो से वीडियो कॉल पर की बातः वार्ता के दौरान मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने आंदोलनकारी नेता देवेंद्र नाथ महतो से वीडियो कॉल पर बातचीत की और उनसे अनशन समाप्त करने का आग्रह किया। बताया गया कि देवेंद्र महतो वार्ता में शामिल होने नहीं पहुंचे थे। उन्होंने मंत्रियों से वार्ता का इंतजार करने का आग्रह किया। यह दृश्य भी आंदोलन की मौजूदा स्थिति का प्रतीक रहा कि सरकार बैठक में बैठी थी, आंदोलनकारी मैदान में थे और मोबाइल स्क्रीन दोनों के बीच पुल का काम कर रही थी।
सरकार ने सुधार का भी दिया भरोसाः सरकार ने जेपीएससी और जेएसएससी की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार के लिए आईआईएम रांची, आईआईटी-आईएसएम और एक्सआईएसएस जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की मदद लेने की बात कही है। सवाल यह है कि परीक्षा आयोगों को सुधारने के लिए विशेषज्ञ संस्थानों की जरूरत पड़ रही है तो क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं है कि व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश काफी गंभीर है?
सरकार का प्रस्ताव है कि परीक्षा प्रणाली, प्रक्रिया और संस्थागत कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार किया जाये। इसके अलावा सीजीएल मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में कमेटी और मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की बात भी सामने आयी है।
98 फीसदी बनाम 2 फीसदी का असली अर्थः सरकार के लिए यह वार्ता इस मायने में बड़ी सफलता है कि उसने आंदोलनकारियों की अधिकांश मांगों पर सहमति जतायी है। लेकिन आंदोलनकारियों के लिए मामला प्रतिशत का नहीं, विश्वास का है। 14वीं जेपीएससी पीटी और दो बैकलॉग परीक्षाएं रद्द करने की मांग मान ली गयी। टीडीपीएल से जुड़ी परीक्षाओं की जांच पर सहमति बन गयी।
आर्थिक पहलुओं की जांच ईडी से कराने का प्रस्ताव आ गया। सीजीएल की जांच के लिए रिटायर जज की कमेटी और फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात भी सामने आ गयी। फिर भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। क्योंकि आंदोलनकारियों की नजर में दो सवाल अब भी अनुत्तरित हैं कि सीजीएल परीक्षा रद्द होगी या नहीं? और पूरे प्रकरण की जांच सीबीआई करेगी या नहीं?
इसलिए सरकार के 98 फीसदी और छात्रों के 2 फीसदी के बीच की दूरी भले आंकड़ों में छोटी दिखाई देती हो, लेकिन राजनीतिक और आंदोलनकारी गणित में फिलहाल यही दो फीसदी सबसे लंबी दूरी साबित हो रही है।
अब सड़क पर होगा फैसलाः वार्ता विफल होने के बाद छात्रों ने विधानसभा घेराव का निर्णय वापस नहीं लिया है। राज्यभर से छात्रों के रांची पहुंचने का दावा किया जा रहा है। आंदोलनकारियों ने एक लाख से अधिक युवाओं के सड़कों पर उतरने का दावा किया है। आज सोमवार का दिन सरकार और आंदोलन दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
एक तरफ सरकार यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि उसने मांगों का बड़ा हिस्सा स्वीकार कर लिया है। दूसरी तरफ आंदोलनकारी यह साबित करना चाहेंगे कि जब तक सीजीएल और सीबीआई वाले सवाल का समाधान नहीं होता, तब तक 98 फीसदी वाला सरकारी हिसाब उनके आंदोलन की कॉपी में पास नहीं है।
फिलहाल तीन परीक्षाओं के रद्द होने की सहमति बन चुकी है, जांच के कई रास्ते खुल चुके हैं और जेपीएससी के तीन सदस्यों के इस्तीफे भी स्वीकार हो चुके हैं। लेकिन झारखंड के प्रतियोगी छात्रों के लिए सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है कि परीक्षा सिर्फ रद्द होगी या परीक्षा व्यवस्था पर से उठ चुका भरोसा भी वापस आयेगा? और शायद यही वह सवाल है, जिसका उत्तर किसी परीक्षा की तरह सिर्फ पास या फेल में नहीं दिया जा सकता।










