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रांची में जनता दरबार मॉडल: दावे बनाम हकीकत, वाकई बदल रही है व्यवस्था?

“रांची में जनता दरबार एक सकारात्मक पहल के रूप में सामने आया है, जिसने प्रशासन और जनता के बीच दूरी को कम करने की कोशिश की है। लेकिन इसमें मजबूत निगरानी व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित का घोर अभाव दिख रहा है…

रांची दर्पण डेस्क/मुकेश भारतीय। रांची जिला प्रशासन द्वारा शुरू किया गया जनता दरबार इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। उपायुक्त मंजू भजयंत्री के नेतृत्व में प्रशासन यह दावा कर रहा है कि इस पहल से आम लोगों की समस्याओं का त्वरित और पारदर्शी समाधान सुनिश्चित किया जा रहा है। हर सोमवार को समाहरणालय में और हर मंगलवार को जिले के सभी अंचलों में जनता दरबार आयोजित किए जा रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंच रहे हैं।

जनता दरबार का उद्देश्य प्रशासन को जनता के द्वार तक पहुंचाना है। इसमें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लोग सीधे अधिकारियों से मिलकर अपनी शिकायतें दर्ज कराते हैं। भूमि विवाद, दाखिल-खारिज, प्रमाण पत्र, पेंशन, आवास योजना, जल-बिजली-सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई प्रमुख रूप से की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि कई मामलों का मौके पर ही समाधान भी किया जा रहा है।

उपायुक्त ने अधिकारियों और कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि कोई शिकायत बार-बार जनता दरबार में आती है तो संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। सभी अंचल अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से मामलों के निष्पादन का निर्देश दिया गया है, ताकि लोगों को त्वरित न्याय मिल सके और प्रशासन के प्रति विश्वास मजबूत हो।

हालांकि, जमीनी स्तर पर तस्वीर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। कई फरियादियों का कहना है कि उनकी शिकायतें दर्ज तो हो जाती हैं, लेकिन समाधान में अपेक्षित गति नहीं दिखती। कुछ मामलों में ऑन-द-स्पॉट समाधान के दावे किए जाते हैं, लेकिन बाद में उन पर अमल में देरी या अड़चनें सामने आती हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या जनता दरबार सिर्फ सुनवाई का मंच बनकर रह गया है या वास्तव में समाधान का माध्यम भी बन पा रहा है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि जनता दरबार जैसी पहल लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि शिकायतों का फॉलो-अप कितना प्रभावी है। केवल आवेदन लेना या निर्देश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि समस्याओं का स्थायी समाधान हो और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

21 अप्रैल 2026 को आयोजित जनता दरबार में आवासीय, जाति, आय प्रमाण पत्र, पंजी-II सुधार, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, पेंशन और CNT एक्ट की धारा 46 से जुड़े मामलों के निष्पादन का दावा किया गया। यह निश्चित रूप से प्रशासनिक सक्रियता को दर्शाता है, लेकिन इन मामलों के दीर्घकालिक परिणामों पर नजर रखना भी उतना ही जरूरी है।

कुल मिलाकर रांची में जनता दरबार एक सकारात्मक पहल के रूप में सामने आया है, जिसने प्रशासन और जनता के बीच दूरी को कम करने की कोशिश की है। लेकिन इसे पूरी तरह सफल बनाने के लिए मजबूत निगरानी व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी होगा। जिसका घोर अभाव दिख रहा है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह मॉडल प्रशासनिक सुधार का उदाहरण बनेगा या केवल एक अस्थायी व्यवस्था बनकर रह जाएगा।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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