
“ओरमांझी-जैना मोड़ एक्सप्रेस-वे सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि झारखंड के विकास की नई रफ्तार का प्रतीक है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह परियोजना समय, तकनीक और पर्यावरण तीनों के बीच संतुलन बनाते हुए सफल हो पाती है या नहीं…
रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची और आसपास के औद्योगिक व खनन क्षेत्रों को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी ओरमांझी-जैना मोड़ एक्सप्रेस-वे परियोजना अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने निर्माण एजेंसियों को स्पष्ट लक्ष्य देते हुए कहा है कि इस हाई-स्पीड कॉरिडोर को अक्तूबर 2026 से पहले हर हाल में चालू किया जाए। इसके साथ ही परियोजना की मॉनिटरिंग भी तेज कर दी गई है। इंजीनियरों की टीम नियमित रूप से साइट निरीक्षण कर रही है।
तेजी से बढ़ता काम, लेकिन कुछ हिस्सों में अड़चनः ओरमांझी से गोला तक लगभग 28 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे का निर्माण कार्य 92 प्रतिशत पूरा हो चुका है। केवल 2.74 किमी का हिस्सा ही बाकी है, जो मुख्य रूप से वन क्षेत्र में पड़ता है। इस कारण निर्माण कार्य फिलहाल रुका हुआ है और वन विभाग से अनुमति मिलने का इंतजार किया जा रहा है।
इसी तरह गोला से जैना मोड़ तक का सेक्शन भी लगभग तैयार है, लेकिन 3-4 किमी हिस्सा वाइल्ड लाइफ जोन में होने के कारण फॉरेस्ट क्लियरेंस का इंतजार कर रहा है। अधिकारियों का अनुमान है कि अनुमति मिलते ही इन हिस्सों में तेजी से काम पूरा कर लिया जाएगा।
सिकिदिरी घाटी में इंजीनियरिंग का बड़ा कामः इस परियोजना का एक अहम और चुनौतीपूर्ण हिस्सा सिकिदिरी घाटी है, जहां पहाड़ों को काटकर सड़क बनाई जा रही है। यह कार्य तकनीकी दृष्टि से जटिल होने के साथ-साथ पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है, ताकि विकास भी हो और पारिस्थितिकी तंत्र भी सुरक्षित रहे।
कैसा होगा यह एक्सप्रेस-वे? यह एक्सप्रेस-वे सामान्य सड़कों से बिल्कुल अलग होगा। वाहनों को बिना रुकावट तेज गति से चलने की सुविधा होगी। बीच में कहीं से भी वाहन चढ़ाने-उतारने की अनुमति नहीं होगी। ओरमांझी से चढ़कर वाहन सीधे जैना मोड़ तक जा सकेंगे।
गोला के पास एंट्री-एग्जिट की संभावना पर विचार जारी है। यह डिजाइन सड़क सुरक्षा और ट्रैफिक फ्लो को बेहतर बनाने के लिए तैयार किया गया है।
आर्थिक और सामाजिक असरः इस एक्सप्रेस-वे के शुरू होने से कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। जैसे- रांची से बोकारो/धनबाद की दूरी और समय में भारी कमी, खनन और औद्योगिक परिवहन में तेजी, स्थानीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा और रोजगार के नए अवसर। विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना झारखंड के आर्थिक नक्शे को बदलने की क्षमता रखती है।
पर्यावरण बनाम विकास का बड़ा सवालः हालांकि परियोजना के अंतिम चरण में सबसे बड़ी चुनौती फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ क्लियरेंस है। वन क्षेत्रों में निर्माण को लेकर पर्यावरणविद लगातार सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या हाई-स्पीड विकास के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय किए गए हैं?
अक्टूबर की डेडलाइन, क्या समय पर पूरा होगा सपना? एनएचएआई की सख्ती और लगातार मॉनिटरिंग को देखते हुए यह उम्मीद जताई जा रही है कि परियोजना तय समयसीमा में पूरी हो जाएगी। लेकिन अंतिम 5-6 किलोमीटर का काम ही इस पूरे प्रोजेक्ट की समयसीमा तय करेगा।










