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PMO से राजस्व विभाग तकः रांची की जमीन शिकायत ने खोली सिस्टम की परतें, क्या होगा असली खुलासा?

“इसमें कोई शक नहीं है कि अगर इस केस में पारदर्शी जांच होती है तो यह रांची जिले के पूरे राजस्व विभाग तंत्र की सफाई की शुरुआत हो सकती है…

रांची दर्पण डेस्क। रांची के कांके अंचल स्थित नेवरी मौजा की जमीन से जुड़ी शिकायत का प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से झारखंड के राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग तक पहुंचना महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य के राजस्व तंत्र की गहराई में मौजूद संभावित गड़बड़ियों की ओर बड़ा संकेत माना जा रहा है।

PMO में दर्ज शिकायत (PMOPG/E/2026/0064661) में आरोप है कि 25 डिसमिल जमीन को रिकॉर्ड में 37 डिसमिल दिखाया गया यानी 12 डिसमिल अतिरिक्त जमीन कथित रूप से “जोड़ दी गई”।

मामले का मूल सवाल जमीन बढ़ी कैसे? यह पूरा विवाद सिर्फ जमीन के क्षेत्रफल का नहीं है, बल्कि राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। क्या यह तकनीकी त्रुटि है? या फिर रिकॉर्ड में जानबूझकर हेरफेर? और अगर हेरफेर है तो किस स्तर पर?

विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीन का रकबा बढ़ना सिस्टमेटिक हस्तक्षेप के बिना संभव नहीं होता, खासकर जब मामला सरकारी रिकॉर्ड का हो।

विभागीय ट्रांसफर संकेत क्या देता है? शिकायत का पहले प्रशासनिक सुधार विभाग और फिर राजस्व विभाग को ट्रांसफर होना एक महत्वपूर्ण संकेत है। अब मामला सही अथॉरिटी (Revenue Dept) के पास है यानी अब रिकॉर्ड सत्यापन, फाइल जांच, जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।  यह ट्रांसफर रूटीन नहीं, बल्कि जांच के वास्तविक चरण में प्रवेश माना जा रहा है।

रांची में जमीन घोटालों की पृष्ठभूमिः यह मामला अकेला नहीं है। हाल के वर्षों में रांची में कई जमीन घोटाले सामने आए हैं। रिम्स जमीन घोटाले में ACB ने अधिकारियों पर कार्रवाई की तैयारी की। 236 करोड़ रुपये के जमीन घोटाले में बड़े नेटवर्क की जांच जारी। ED जांच में 500 करोड़ से अधिक के संगठित भूमि घोटाले का खुलासा। आइएएस अधिकारी तक जेल जा चुके। इन मामलों से भी एक पैटर्न सामने आता है कि फर्जी दस्तावेज + प्रशासनिक मिलीभगत + धीमी जांच = बड़ा घोटाला।

सिस्टम की कमजोरी या सुनियोजित खेल? इस केस में तीन स्तर पर सवाल उठते हैं।  रिकॉर्ड सिस्टम पर सवाल यानि यदि जमीन का रकबा बदल गया तो क्या डिजिटल रिकॉर्ड (जैसे झारभूमि) सुरक्षित हैं? या सिस्टम में छेड़छाड़ संभव है?

शिकायत में बताया गया है कि अधिकारियों को जानकारी दी गई। फिर भी कार्रवाई नहीं हुई।  यह प्रशासनिक उदासीनता या संलिप्तता दोनों में से एक की ओर इशारा करता है।

जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता के सवाल भी सामने हैं। ACB में शिकायत लंबित है। अब PMO के हस्तक्षेप से यह सवाल उठना लाजमि है कि क्या बिना केंद्रीय हस्तक्षेप के निष्पक्ष जांच संभव है?

CBI जांच की मांग क्यों अहम? शिकायतकर्ता ने CBI जांच की मांग की है। यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य एजेंसियों पर पहले भी धीमी जांचके आरोप लगे हैं। बड़े मामलों में ED/CBI के आने पर ही नेटवर्क उजागर हुए हैं।  इसलिए यह केस अब लोकल विवाद से बढ़कर गवर्नेंस टेस्ट केस बनता जा रहा है

आगे क्या हो सकता है? राजस्व विभाग रिकॉर्ड सत्यापन कर जांच शुरु कर सकती है। वह जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांग सकती है। ACB केस को तेज किया जा सकता है। जरूरत पड़ी तो CBI/ED की एंट्री हो सकती है, क्योंकि इस मामले के पीछे कई बड़े रहस्य छुपे होने की प्रबल आशंका है।

यह सिर्फ जमीन नहीं, सिस्टम का सवाल हैः नेवरी मौजा का यह मामला अब सिर्फ 12 डिसमिल जमीन का नहीं रहा। यह क्या सरकारी रिकॉर्ड सुरक्षित हैं? क्या अधिकारी जवाबदेह हैं? और क्या आम नागरिक को न्याय मिल सकता है? जैसे सवाल बन चुके हैं। जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है कि अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राजस्व विभाग क्या कार्रवाई करता है।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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