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रिम्स शासी परिषद की बैठक में मंत्री, सांसद, एसीएस और निदेशक की सिर्फ बहसबाजी हुई

रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स की शासी परिषद (जीबी) की 63वीं बैठक बुधवार को उस समय गरमा गई, जब निदेशक डॉ राजकुमार और स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी के बीच तीखी बहस छिड़ गई। किडनी ट्रांसप्लांट शुरू करने की मंत्री की मंशा पर निदेशक ने डॉक्टरों की कमी का हवाला देकर सवाल उठाया तो बात बिगड़ गई।

निदेशक ने कहा कि अगर रिम्स के विकास में मैं ही रोडा हूं तो छोड़ देता हूं। इसके जवाब में अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने तपाक से कहा कि तो छोड़ दीजिए। मंत्री ने भी दोहराया कि तो आप रिम्स छोड़ दीजिए।

यह सुनकर निदेशक ने पीछे हटते हुए कहा कि ऐसे तो नहीं छोड़ सकता। इसके बाद मामला शांत हो गया, लेकिन बैठक में मौजूद सदस्यों के चेहरे पर तनाव साफ झलक रहा था।

बैठक की शुरुआत स्वास्थ्य मंत्री सह जीबी चेयरमैन डॉ इरफान अंसारी की अध्यक्षता में हुई। कुल 16 मुद्दों पर चर्चा हुई। सबसे पहले 62वीं बैठक के फैसलों की समीक्षा की गई।

निदेशक डॉ राजकुमार ने बताया कि मरीज की मौत पर परिजनों को 5 हजार रुपये की सहायता राशि देने की योजना अंतिम चरण में है, इसे जल्द लागू किया जाएगा। वेंटिलेटर खरीद पर उन्होंने कहा कि 75 मशीनों की प्रक्रिया चल रही है, जबकि 100 वेंटिलेटर की खरीद में तकनीकी दिक्कत दूर कर ली गई है।

नए एजेंडे में ब्लड बैंक के लिए नैट मशीन खरीदने का फैसला लिया गया। लेकिन असली हंगामा किडनी ट्रांसप्लांट पर हुआ। मंत्री ने इसे शुरू करने की इच्छा जताई तो निदेशक ने डॉक्टरों की नियुक्ति न होने का मुद्दा उठाया।

इसी बीच रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने रिम्स की व्यवस्था पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा कि रिम्स की बेहतरी के लिए हाईकोर्ट का निर्देश कारगर साबित हो रहा है, लेकिन प्रशासन पूरी तरह डिरेल हो चुका है। शीघ्र ही मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना चाहिए।

सेठ ने आश्रय गृह का उदाहरण देते हुए कहा कि 20 करोड़ रुपये की पावर ग्रिड फंडिंग से इसे तैयार किया गया, लेकिन एजेंसी चयन न होने से यह खंडहर बन जाएगा। अगर यही हाल रहा तो मरीज फर्श पर सोते रहेंगे। सेवा देने वाली संस्थाएं तैयार हैं, लेकिन संचालन नहीं हो रहा।

वेंटिलेटर मुद्दे पर निदेशक ने चेतावनी दी कि सिर्फ 100 अतिरिक्त मशीनें खरीदने से फायदा नहीं। इन्हें चलाने के लिए 250 नर्स, डॉक्टर और टेक्नीशियन की टीम चाहिए, वरना मशीनें धूल फांकती रहेंगी।

मेडिकल ऑफिसर की प्रोन्नति पर सहमति बनी, लेकिन नियमावली बनाने को कहा गया। एसोसिएट प्रोफेसर और एडिशनल प्रोफेसर की नियुक्ति पर भी कमेटी के फैसले के बावजूद नियमावली पर जोर दिया गया।

मंत्री ने सख्त तेवर दिखाते हुए कहा कि डॉक्टरों की उपस्थिति, निजी प्रैक्टिस पर रोक, ओपीडी अनुशासन और सफाई पर कड़ी कार्रवाई होगी। फैसले अब कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए।

अगली बैठक में नए भवन, डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम और पेशेंट फैसिलिटेशन सेंटर पर चर्चा होगी। मंत्री ने रिम्स को झारखंड का मॉडल हॉस्पिटल बनाने का संकल्प दोहराया।

बैठक के बाद सेठ की ‘रिम्स डिरेल’ टिप्पणी पर मंत्री ने पलटवार किया कि वह देश की रक्षा करें, हमें रिम्स की चिंता है। बैठक में कुछ और बोलते हैं, बाहर कुछ और। मैं उनका सम्मान करता हूं, सुझाव देना चाहें तो दें।

निदेशक विवाद पर मंत्री बोले कि मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं। सब नियमों और पारदर्शिता से होगा। निदेशक और हमारे बीच कोई मतभेद नहीं, हम एक टीम हैं।

इस बैठक में सांसद संजय सेठ, विधायक सुरेश बैठा, निदेशक डॉ राजकुमार और अन्य वरिष्ठ सदस्य मौजूद थे। रिम्स की ये आंतरिक कलह मरीजों की उम्मीदों पर सवाल खड़े कर रही है। क्या अगली बैठक में सुधार दिखेगा? देखना दिलचस्प होगा।

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