रांची पहाड़ी मंदिर प्रबंधन विवाद: ऑडिट रिपोर्ट, फंड ट्रांजैक्शन और नई कमेटी पर उठे गंभीर सवाल

अब सभी की नजर न्यायालय के फैसले और संभावित जांच प्रक्रिया पर टिकी है, जो यह तय करेगी कि रांची पहाड़ी मंदिर से जुड़े आरोपों की सच्चाई क्या है और जिम्मेदारी किसकी…

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी में ऐतिहासिक और आस्था के प्रमुख केंद्र रांची पहाड़ी मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद अब गंभीर रूप लेता जा रहा है। मंदिर की वर्तमान विकास समिति और नवगठित कमेटी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है, जिसमें वित्तीय अनियमितताओं, पारदर्शिता की कमी और प्रशासनिक हस्तक्षेप जैसे कई संवेदनशील मुद्दे सामने आए हैं।

मंदिर परिसर में आयोजित प्रेस वार्ता में समिति के सदस्यों आनंद गाड़ोदिया, राजकुमार शर्मा, जितेंद्र प्रसाद और सौरभ चौधरी ने पूर्व कार्यकाल के दौरान हुए वित्तीय लेन-देन पर गंभीर सवाल खड़े किए। उनका आरोप है कि कई खर्चों का न तो स्पष्ट हिसाब उपलब्ध है और न ही वैध दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं। समिति का दावा है कि हालिया ऑडिट रिपोर्ट में ऐसे कई ट्रांजैक्शन सामने आए हैं, जिनमें पारदर्शिता की कमी साफ दिखती है।

समिति के अनुसार कुछ लेन-देन पूर्व सचिव से जुड़े नामों पर दर्शाए गए हैं, जबकि कई राशियों को लोन और एडवांस के रूप में दिखाया गया है, लेकिन उनके उपयोग और लाभार्थियों का पूरा विवरण अनुपलब्ध है। जिन नामों का उल्लेख किया गया है, उनमें आशीष कुमार, नेहा साहू, रिंकी देवी, अक्षय कुमार और राकेश सिन्हा सहित अन्य शामिल हैं। इसके अलावा धार्मिक न्यास बोर्ड को भी चार लाख रुपये दिए जाने की बात कही गई है, जिस पर भी सवाल उठाए गए हैं।

समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि धार्मिक न्यास बोर्ड पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करता है तो उसे अपने कार्यकाल के दौरान हुए सभी वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। साथ ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग करते हुए विवादित अधिसूचना को रद्द करने की अपील की गई है।

वहीं दूसरी ओर नवगठित कमेटी के सचिव राकेश सिन्हा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पलटवार किया है। उनका कहना है कि आरोप लगाना आसान है, लेकिन वास्तविकता जल्द ही सामने लाई जाएगी। उन्होंने दावा किया कि मंदिर फंड से हुए हर खर्च का पूरा रिकॉर्ड कार्यालय में सुरक्षित है और समय आने पर जनता के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

राकेश सिन्हा ने अपने कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा कि मंदिर के विकास के लिए लगभग सात करोड़ रुपये का फंड लाया गया था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि उस राशि का उपयोग किस प्रकार हुआ, इसका जवाब कौन देगा। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि करीब दस लाख रुपये के कबाड़ को बिना किसी निविदा प्रक्रिया के बेच दिया गया, जो अपने आप में गंभीर अनियमितता है।

इस पूरे मामले पर धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने माना कि मामला गंभीर है और यदि मंदिर के धन का दुरुपयोग हुआ है तो कार्रवाई निश्चित है। उन्होंने संकेत दिया कि मामले की समीक्षा के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि हाल ही में धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा पहाड़ी मंदिर और एक अन्य प्रमुख मंदिर के लिए नई कमेटी गठित कर अधिसूचना जारी की गई थी, जिसके बाद से यह विवाद सामने आया है। वर्तमान समिति ने इस नई कमेटी को न्यायालय में चुनौती दी है और मामला विचाराधीन है।

समिति ने चेतावनी दी है कि न्यायालय के निर्णय से पहले यदि किसी भी पक्ष द्वारा जबरन मंदिर का प्रभार लेने की कोशिश की जाती है तो उसका लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा।

यह विवाद केवल एक मंदिर प्रबंधन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बड़े सवाल को भी उजागर करता है। जिस तरह से ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाए जा रहे हैं और जवाब में विकास कार्यों का हवाला दिया जा रहा है, उससे साफ है कि मामला तथ्य और विश्वास दोनों के टकराव का रूप ले चुका है।

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