RIMS land scam: ACB की जांच में बड़ा खुलासा, CO से लेकर DCLR तक पर FIR की तैयारी

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची स्थित प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) की जमीन से जुड़े कथित घोटाले (RIMS land scam) की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। इस मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने कई महत्वपूर्ण तथ्य जुटाए हैं, जिसके आधार पर तत्कालीन अंचल अधिकारियों से लेकर भूमि प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों तक पर प्राथमिकी दर्ज करने की तैयारी की जा रही है।
जांच एजेंसी के सूत्रों के अनुसार रिम्स के लिए अधिग्रहित की गई जमीन को निजी लोगों के नाम गलत तरीके से बेचे जाने और उसका म्यूटेशन तथा रजिस्ट्री कराने के मामले में प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही और संभावित मिलीभगत के संकेत मिले हैं।
अधिकारियों से पूछताछ पूरीः ACB की जांच टीम ने इस मामले में तत्कालीन डीसीएलआर मनोज कुमार रंजन और अंचल अधिकारी रवि रंजन कुमार से विस्तृत पूछताछ पूरी कर ली है। दोनों अधिकारियों को पहले नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
सूत्रों के मुताबिक पूछताछ के दौरान जमीन के अधिग्रहण रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेखों और रजिस्ट्री दस्तावेजों से जुड़े कई सवाल पूछे गये। जांच एजेंसी यह समझने की कोशिश कर रही है कि जब जमीन पहले ही सरकारी उद्देश्य के लिए अधिग्रहित थी, तो उसकी बिक्री और म्यूटेशन की अनुमति कैसे मिल गई।
जमीन अधिग्रहण के बाद भी हुई बिक्रीः प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस जमीन को पहले ही रिम्स के विस्तार और चिकित्सा सुविधाओं के विकास के लिए अधिग्रहित किया गया था, वही जमीन बाद में निजी लोगों के नाम रजिस्ट्री कर दी गई। इस प्रक्रिया में म्यूटेशन भी कराया गया, जिससे जमीन का राजस्व रिकॉर्ड बदल गया।
जांच से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में कई स्तरों पर अनदेखी, लापरवाही और संभावित गड़बड़ी हुई है। यदि जमीन के अधिग्रहण का रिकॉर्ड ठीक से देखा जाता, तो ऐसी स्थिति ही नहीं बनती।
अतिक्रमण हटाने के बाद दर्ज हो रहे बयानः मामले के एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू के तहत उन लोगों के भी बयान दर्ज किये गये हैं, जिनके घर बाद में अतिक्रमण बताकर तोड़ दिये गये थे।
ACB यह जानने की कोशिश कर रही है कि क्या इन लोगों ने जमीन खरीदते समय सरकारी रिकॉर्ड की जांच की थी। क्या उन्हें जमीन के अधिग्रहण की जानकारी थी और क्या किसी अधिकारी या बिचौलिये ने उन्हें गुमराह किया था। इन बयानों से जांच एजेंसी को घोटाले की पूरी श्रृंखला समझने में मदद मिल रही है।
हाईकोर्ट के निर्देश पर चल रही जांचः यह पूरा मामला झारखंड हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जांच के दायरे में आया। अदालत ने जमीन से जुड़े दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में संभावित अनियमितताओं को देखते हुए विस्तृत जांच का आदेश दिया था। इसी आदेश के बाद ACB ने केस दर्ज कर जांच शुरू की और अब धीरे-धीरे मामले के कई परतें खुलने लगी हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवालः यह मामला केवल जमीन की अवैध बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अधिग्रहित जमीन का रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से अपडेट रहता, तो ऐसी गड़बड़ी की संभावना काफी कम हो सकती थी।
आगे क्या? ACB के अधिकारियों के अनुसार कई अन्य लोगों से अभी पूछताछ बाकी है। दस्तावेजों का तकनीकी परीक्षण किया जा रहा है। जल्द ही आरोपियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला झारखंड के सबसे चर्चित भूमि घोटालों में शामिल हो सकता है। स्रोतः एक्सपर्ट मीडिया रिपोर्टस्





