रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में ग्रामीण क्षेत्रों में भवनों का नक्शा पास करने के अधिकार को लेकर उठे बड़े कानूनी विवाद पर हाईकोर्ट ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। रांची क्षेत्रीय विकास प्राधिकार (आरआरडीए) द्वारा एकल पीठ के आदेश को चुनौती देने वाली अपील याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश पारित किया।
क्या है पूरा मामला? दरअसल मामले की जड़ में यह सवाल है कि क्या पंचायतीराज अधिनियम से शासित ग्रामीण क्षेत्रों में आरआरडीए को भवनों के नक्शे पास करने और निर्माण संबंधी कार्रवाई करने का अधिकार है या नहीं?
पूर्व में एकल पीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि झारखंड पंचायत राज अधिनियम, 2001 लागू होने के बाद पंचायतीराज अधिनियम के तहत आने वाले क्षेत्रों में आरआरडीए को भवन योजनाओं की मंजूरी देने का कोई अधिकार नहीं है।
अदालत ने यह भी कहा था कि संविधान के भाग-9 तथा 11वीं अनुसूची के तहत जो क्षेत्र पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, वहां क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण अधिनियम के तहत गठित संस्थाएं हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
एकल पीठ ने यह भी टिप्पणी की थी कि झारखंड क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण अधिनियम की धारा-30 के तहत ऐसे क्षेत्रों में भवन योजना की अनुमति लेने की कोई बाध्यता नहीं बनती।
आरआरडीए का पक्षः आरआरडीए की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने खंडपीठ के समक्ष जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि प्राधिकरण को अपने अधिसूचित क्षेत्राधिकार में भवनों का नक्शा पास करने और नियमों के अनुरूप कार्रवाई करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
उन्होंने दलील दी कि एकल पीठ द्वारा दिया गया आदेश विधि सम्मत नहीं है और इससे प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होगी। वहीं महाधिवक्ता ने अदालत से एकल पीठ के आदेश को निरस्त करने का आग्रह किया। आरआरडीए की ओर से इस संबंध में अलग-अलग अपील याचिकाएं दाखिल की गई हैं।
झारखंड हाईकोर्ट का अंतरिम रुखः दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने फिलहाल मामले में यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। साथ ही प्रतिवादी को नोटिस जारी किया गया है, जो 25 फरवरी तक प्रत्यावर्तनीय होगा। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को निर्धारित की गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला? यह मामला केवल आरआरडीए तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में भवन निर्माण की स्वीकृति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। यदि एकल पीठ का आदेश कायम रहता है तो पंचायत क्षेत्रों में भवन नक्शा स्वीकृति का अधिकार पंचायत संस्थाओं को मिलेगा, जबकि आदेश पलटने की स्थिति में क्षेत्रीय विकास प्राधिकरणों की भूमिका मजबूत हो सकती है।
इस विवाद का सीधा असर ग्रामीण विकास, भवन निर्माण, भूमि उपयोग और स्थानीय स्वशासन की संरचना पर पड़ने की संभावना है। फिलहाल सभी की नजरें 25 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जब इस संवैधानिक और प्रशासनिक टकराव पर अदालत का अगला रुख सामने आएगा।
समचार स्रोत: मीडिया रिपोर्ट्स / मुकेश भारतीय








