रांची दर्पण डेस्क। रांची समेत पूरे झारखंड में युवाओं के बीच नशे की लत तेजी से बढ़ रही है और अब यह केवल सामाजिक समस्या नहीं बल्कि एक गंभीर मानसिक-स्वास्थ्य संकट का रूप लेती दिखाई दे रही है।
हाल के महीनों में राजधानी में आयोजित कुछ निजी कार्यक्रमों में एलएसडी जैसे हाई-एंड ड्रग्स के इस्तेमाल की चर्चा ने भी प्रशासन और चिकित्सा संस्थानों को सतर्क कर दिया है।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के आंकड़ों ने खोली सच्चाईः राज्य के प्रमुख मनोचिकित्सा संस्थान सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकियाट्री (CIP) में नशा मुक्ति के लिए अलग “सेंटर फॉर एडिक्शन साइकियाट्री” चलाया जा रहा है, जहां 60 बेड केवल गंभीर नशे के मरीजों के लिए आरक्षित हैं।
संस्थान के अनुसार हर साल लगभग 2,800 से 3,000 मरीज नशे से संबंधित इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं, जबकि 600 से 700 गंभीर मरीजों को भर्ती कर डिटॉक्स उपचार देना पड़ता है।
2025 की वार्षिक रिपोर्ट में कुल ओपीडी अटेंडेंस 1,17,202 दर्ज की गई, जिसमें बड़ी संख्या नशे और उससे जुड़ी मानसिक बीमारियों की थी। इसी तरह रिनपास (RINPAS) में प्रतिदिन औसतन 400-500 मानसिक रोगी ओपीडी में आते हैं और इनमें से 15 से 20 प्रतिशत केस सीधे तौर पर शराब या ड्रग्स की लत से जुड़े पाए जा रहे हैं।
18 से 35 वर्ष के युवा सबसे अधिक प्रभावितः इन दोनों संस्थानों के डेटा का विश्लेषण बताता है कि सबसे अधिक मरीज 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के हैं। शहरी युवाओं में ब्राउन शुगर और सिंथेटिक ड्रग्स का चलन तेजी से बढ़ा है, जबकि ग्रामीण इलाकों में अफीम और डोडा की लत प्रमुख बनी हुई है।
डॉक्टरों के अनुसार नशे से जुड़ी मानसिक बीमारी साइकोसिस यानी मतिभ्रम के मामलों में लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महिला मरीजों की संख्या अभी पुरुषों से कम है, लेकिन पिछले तीन वर्षों में नशे की लत के कारण इलाज के लिए आने वाली महिलाओं की संख्या भी लगातार बढ़ी है।
जिलों में अफीम की खेती और शहरों में ब्राउन शुगर का जालः राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल 27 हजार एकड़ से अधिक भूमि पर अवैध अफीम की खेती को नष्ट किया गया। विशेष रूप से खूंटी, चतरा, लातेहार और पलामू जैसे जिलों में हजारों एकड़ जमीन पर अफीम उगाए जाने की पुष्टि हो चुकी है।
वहीं दूसरी ओर जमशेदपुर, रांची और सरायकेला जैसे शहरी क्षेत्रों में 15 से 25 वर्ष के युवाओं के बीच ब्राउन शुगर सबसे तेजी से फैलने वाला नशा बन चुका है। ग्रामीण इलाकों में हड़िया और महुआ का अत्यधिक सेवन भी स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा रहा है।
देशभर में भी बढ़ रही नशे की समस्याः राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार 2022 में देशभर में लगभग 17 लाख किलोग्राम कैनाबिस जब्त किया गया, जबकि 2021 में यह आंकड़ा करीब 8 लाख किलोग्राम था। हेरोइन की जब्ती भी 2022 में लगभग 4,800 किलोग्राम तक पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार 2023 में भारत में औसतन हर सप्ताह करीब 12 ड्रग ओवरडोज से मौतें दर्ज की गईं।
सामाजिक और पारिवारिक संकट में बदलती लतः मनोचिकित्सकों का कहना है कि अब नशे की लत केवल अपराध या अवैध व्यापार का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को भी प्रभावित कर रही है। इलाज के लिए आने वाले कई युवाओं की पढ़ाई छूट चुकी है, कई का पारिवारिक जीवन टूट चुका है और बड़ी संख्या में किशोर इनहेलेंट (विनर, डेंड्राइट) जैसी सस्ती और खतरनाक चीजों के शिकार बन रहे हैं।
सरकार और समाज के लिए चेतावनीः विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्कूल-कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान, काउंसिलिंग और समय पर इलाज की व्यवस्था नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में झारखंड को एक बड़े मानसिक-स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।
नशे के बढ़ते मामलों और मानसिक बीमारियों की बढ़ती संख्या यह साफ संकेत देती है कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि एक सामाजिक चुनौती है, जिसके लिए सरकार, परिवार और समाज तीनों को मिलकर काम करना होगा।
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