
रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में नगर निकाय चुनाव की घोषणा होते ही सियासी गलियारों से लेकर मोहल्लों और वार्डों तक सरगर्मी तेज हो गई है। संभावित प्रत्याशी जहां अपने-अपने क्षेत्रों में जनसंपर्क बढ़ाने में जुट गए हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव लड़ने की पात्रता, नियम और आवश्यक दस्तावेजों को लेकर जानकारी जुटाने की होड़ भी मची है।
कई पुराने चेहरे दोबारा मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं तो कई नए चेहरे पहली बार किस्मत आजमाने की सोच रहे हैं। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में उतरना सिर्फ लोकप्रियता या राजनीतिक पकड़ का मामला नहीं, बल्कि नियमों और कागजातों की कसौटी पर खरा उतरना भी उतना ही जरूरी है।
झारखंड नगर पालिका अधिनियम और राज्य निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों के तहत मेयर, अध्यक्ष और वार्ड पार्षद पद के लिए चुनाव लड़ने के स्पष्ट नियम तय किए गए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने पहले ही साफ कर दिया है कि नामांकन के दौरान दस्तावेजों में किसी भी तरह की गड़बड़ी या गलत जानकारी पाए जाने पर नामांकन रद्द किया जा सकता है।
इतना ही नहीं यदि कोई प्रत्याशी गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेज के सहारे निर्वाचित भी हो जाता है, तो बाद में उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है। यही कारण है कि संभावित प्रत्याशी इस बार बेहद सतर्क नजर आ रहे हैं।
कौन बन सकता है नगर निकाय का प्रतिनिधि
चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु और अन्य शर्तों को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान हैं। वार्ड पार्षद पद के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है, जबकि मेयर और नगर परिषद अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार की आयु कम से कम 30 वर्ष होनी चाहिए। इसके साथ ही उम्मीदवार का भारतीय नागरिक होना और संबंधित नगर निकाय क्षेत्र का मतदाता होना अनिवार्य है।
कानून के तहत चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित व्यक्ति नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकता। इसके अलावा उम्मीदवार किसी सरकारी सेवा में कार्यरत न हो और न ही किसी लाभ के पद पर हो। केंद्र, राज्य सरकार या स्थानीय निकाय से अनुदान प्राप्त किसी संस्था में पदधारी व्यक्ति भी चुनाव लड़ने के योग्य नहीं माना जाएगा। एक और अहम शर्त यह है कि उम्मीदवार पर नगर निकाय का कोई बकाया कर या शुल्क लंबित नहीं होना चाहिए।
दो संतान का नियम बना सबसे बड़ा रोड़ा
नगर निकाय चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय दो संतान का नियम बना हुआ है। झारखंड में यह प्रावधान नौ फरवरी 2013 से लागू है। इसके तहत निर्धारित तिथि के बाद दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति नगर निकाय चुनाव नहीं लड़ सकते।
खास बात यह है कि यदि इस तिथि के बाद जुड़वां बच्चों का जन्म होता है और इससे कुल संतानों की संख्या तीन हो जाती है, तब भी संबंधित व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाएगा।
इस नियम में किसी भी प्रकार की छूट का उल्लेख नहीं है। यही वजह है कि कई संभावित प्रत्याशी इस शर्त को लेकर चिंतित दिख रहे हैं और अपने पारिवारिक दस्तावेज खंगाल रहे हैं।
नामांकन के समय किन दस्तावेजों की जरूरत
नामांकन प्रक्रिया के दौरान उम्मीदवारों को कई जरूरी दस्तावेज जमा करने होते हैं। इसमें सबसे पहले निर्धारित नामांकन पत्र शामिल है, जिसे पूरी तरह और सही तरीके से भरना अनिवार्य है।
इसके साथ मतदाता पहचान पत्र (एपिक), शपथ पत्र (एफिडेविट) भी देना होता है। शपथ पत्र में आपराधिक मामलों का पूरा विवरण, चल-अचल संपत्ति का ब्योरा और देनदारियों की जानकारी देना जरूरी है।
इसके अलावा पासपोर्ट साइज फोटो, आरक्षित पद के लिए संबंधित प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आयु प्रमाण पत्र (जन्म प्रमाण पत्र या मैट्रिक प्रमाण पत्र) भी जमा करने होते हैं।
आरक्षित वर्ग से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को जाति प्रमाण पत्र देना अनिवार्य है। साथ ही नगर निकाय का कोई बकाया नहीं होने का प्रमाण पत्र भी नामांकन के समय जरूरी दस्तावेजों में शामिल है।
किन हालात में हो सकते हैं अयोग्य
नगर निकाय चुनाव में अयोग्यता के प्रावधान भी बेहद सख्त हैं। सक्षम न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। गैर-राजनीतिक अपराध में छह माह से अधिक की सजा पाने वाले व्यक्ति भी अयोग्य माने जाएंगे। किसी आपराधिक मामले में छह महीने से अधिक समय तक फरार रहने वाले व्यक्ति पर भी चुनाव लड़ने की रोक है।
यदि किसी व्यक्ति ने नगर निकाय का बकाया भुगतान नहीं किया है, तो वह भी चुनाव के लिए अयोग्य होगा। इसके अलावा पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार या कर्तव्यहीनता के आरोप सिद्ध होने पर भी व्यक्ति की उम्मीदवारी खारिज हो सकती है या निर्वाचित होने के बाद उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
सतर्क हुए संभावित प्रत्याशी
राज्य निर्वाचन आयोग की सख्ती को देखते हुए संभावित प्रत्याशी अब पहले से ज्यादा सतर्क हो गए हैं। कई लोग वकीलों और चुनावी जानकारों से सलाह ले रहे हैं ताकि नामांकन के दौरान किसी तरह की गलती न हो। कुछ प्रत्याशी अपने पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की दोबारा जांच करा रहे हैं, तो कुछ नए उम्मीदवार पहली बार इन नियमों से रूबरू हो रहे हैं।
चुनावी जानकारों का मानना है कि इन सख्त प्रावधानों का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना है। इससे ऐसे लोग ही जनप्रतिनिधि बन पाएंगे, जिनका रिकॉर्ड साफ हो और जो कानून के दायरे में रहते हुए जनता की सेवा कर सकें।
लोकतंत्र की मजबूती की दिशा में कदम
नगर निकाय चुनाव लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का अहम जरिया माने जाते हैं। स्थानीय स्तर पर चुने गए प्रतिनिधि शहर और कस्बों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उम्मीदवारों की पात्रता और ईमानदारी पर जोर देना जरूरी है। राज्य निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश इसी दिशा में एक मजबूत कदम माने जा रहे हैं।
आने वाले दिनों में जैसे-जैसे नामांकन की प्रक्रिया शुरू होगी, वैसे-वैसे चुनावी माहौल और गर्माएगा। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में उतरने से पहले हर दावेदार को नियमों की कसौटी पर खुद को परखना होगा। साफ है कि नगर निकाय चुनाव सिर्फ जनसमर्थन की नहीं, बल्कि नियमों का पालन करने की भी अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं।
( रांची दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय का आलेख )










