रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची के कांके अंचल के मौजा नेवरी गांव में एक ऐसी जमीन का मामला सामने आया है, जो आदिवासी समुदाय की सदियों पुरानी विरासत को चुनौती दे रहा है। भू-नक्शा (भू-नक्शा) और खतियान (आरओआर) में स्पष्ट रूप से उरांव जनजाति के मूल निवासियों के नाम दर्ज हैं, लेकिन रजिस्ट्री रजिस्टर-दो में एक ही प्लॉट पर दर्जनों नाम चमक रहे हैं।
आश्चर्यजनक बात यह है कि इन नामों से जुड़े म्यूटेशन (नामांतरण) केस एकदम गायब हैं! क्या यह जमीन हड़पने की साजिश है या सरकारी रिकॉर्ड्स में लापरवाही? रांची दर्पण ने इन दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया है, जो एक गंभीर सवाल खड़ा करता है कि आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
झारखंड भूमि सुधार विभाग के खतियान (रिकॉर्ड ऑफ राइट्स) दस्तावेज (आरओआर) के अनुसार खाता नंबर 76, मौजा नेवरी, हल्का-09 में कुल 12 प्लॉट्स दर्ज हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 5 एकड़ 59 डिसमील है। इनमें से प्लॉट नंबर 1306 सबसे विवादास्पद है। खतियान में इस प्लॉट को दोन दो 7 श्रेणी का बताया गया है, जिसका क्षेत्रफल 81 डिसमील है। चौहद्दियां (सीमाएं) साफ हैं।
यहां जमीन मूल मालिक टोकैत गीरधारी सीध वगैरह के नाम से जुड़े हैं, लेकिन रैयत के रूप में उरांव जनजाति के सदस्य प्रमुख हैं। जैसे- मुटर उराव (पिता: शनिचरवा उराव), वीशुन उराव, महादेव उराव, बटुआ मुन्डा, खेदुआ उराव, नीज, गनेश हजाम, सेख रसेम, परसा कुरमी, निज हजाम, पथल आदि। ये नाम आदिवासी समुदाय की पहचान हैं, जो सदियों से इस जमीन पर खेती-बाड़ी और वन उत्पादों पर निर्भर हैं।
खतियान में प्लॉट्स की किस्में भी विविध हैं। टाड़ (जंगल), दोन (खेती योग्य), मकान/सहन (आवासीय)। कुल मिलाकर, यह दस्तावेज आदिवासी भूमि अधिकार अधिनियम (पीईएसए एक्ट, 2006) के तहत संरक्षित लगती है, जहां गैर-आदिवासियों को बेचान पर सख्त पाबंदी है।
भू-नक्शा पोर्टल (भू-नक्शा) के स्नैपशॉट से स्थिति और उलझी हुई नजर आती है। प्लॉट नंबर 1306, खाता 76 में वर्तमान मालिकों के नाम हैं। दिलीप कुमार पोद्दार, मोहम्मद अनीस अंसारी, सुनील कुमार देवी, रवि कुमार स्वेती, उर्मिला देवी आदि। यह प्लॉट कांके-09 हल्का के अंतर्गत आता है और नक्शे में यह 1306 नंबर से चिह्नित है, जो पड़ोसी प्लॉट्स (1307, 1300, 1319, 1317) से घिरा हुआ है।
नक्शे के विस्तृत विवरण में जमीनदार के रूप में “टोकैत गीरधारी सीध वगैरह” का उल्लेख है, लेकिन रैयत के नाम बदल चुके दिखते हैं। दिलीप कुमार पोद्दार आदि का नाम प्रमुखता से आता है, जो खतियान के आदिवासी नामों से बिल्कुल अलग है। यह विसंगति सवाल उठाती है कि क्या यह गैर-आदिवासी हस्तांतरण बिना मंजूरी के हुआ? पीईएसए एक्ट के मुताबिक ऐसी जमीन पर बाहरी खरीद-फरोख्त अवैध है, और डीसी (उपायुक्त) की अनुमति जरूरी है।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा रजिस्टर-दो (म्यूटेशन रजिस्टर) से आता है। दिलीप कुमार पोद्दार, सुमित्रा देवी, यशोदा राय, चंद्र भूषण, डी.एस. पोद्दार आदि। कुल 7-8 ट्रांजेक्शन प्लॉट 1306 से लिंक हैं। यह एक बड़ा सवाल है कि ये नाम कैसे जुड़े? क्या यह फर्जी एंट्री या सिस्टम की खामी है?
एमआईएसआरओआर (मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर रिकॉर्ड्स) के पेजों से भी यही पुष्टि होती है। खाता 76 के प्लॉट्स में उरांव, मुंडा, कुरमी जैसे आदिवासी नामों का जिक्र है, लेकिन हाल के रिकॉर्ड्स में गैर-आदिवासी नाम घुसपैठिए की तरह दिखते हैं।
हालांकि कांके जैसे अंचल में आदिवासी भूमि पर यूं अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है। नेवरी जैसे गांवों में रियल एस्टेट माफिया और बाहरी व्यापारियों की नजर हमेशा रहती है।
एक स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता ने रांची दर्पण से कहा कि हमारी जमीन खतियान में सुरक्षित है, लेकिन रजिस्ट्री में नाम बदलते ही सब कुछ छिन जाता है। म्यूटेशन न होने पर भी नाम जुड़ना मतलब सिस्टम में भ्रष्टाचार!
विभागीय स्रोतों के अनुसार कांके अंचल में पिछले 5 सालों में 200 से ज्यादा ऐसी शिकायतें आई हैं, लेकिन कार्रवाई न के बराबर। जबकि पीईएसए एक्ट के तहत आदिवासी जमीन पर बिक्री प्रतिबंधित है, लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड्स की कमजोरी का फायदा उठाया जा रहा है।








