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हल्ला बोलः जिस कांग्रेस ने RTI दिया उसी की ‘हेमंत राज’ में PIO-FFA की हालत देखिए

रांची दर्पण डेस्क। यहां झारखंड के सुदूर क्षेत्रों के दर्द क्या बयां करें, राजधानी रांची में सूचना अधिकार अधिनियम (RTI) का पूरा मजाक उड़ाया जा रहा है। कांके अंचल कार्यालय में मानो कोई फिल्म चल रही हो कि हीरो ने सूचना माँगी, विलेन (यानी PIO सह अंचलाधिकारी अमित भगत) ने मुस्कुराते हुए आवेदन को कागज की टोकरी में डाल दिया और फिर आराम से चाय पीने लगे। अवधि गुजर गए, चाय भी ठंडी हो गई पर जवाब का नामोनिशान तक नहीं।

आवेदक ने सोचा कि चलो ऊपर चलते हैं। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (FFA) यानी रांची सदर एसडीओ उत्कर्ष कुमार साहब के पास पहुँचे। एसडीओ साहब ने भी कमाल कर दिया। तीन बार नोटिस थमाए। पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा… हर नोटिस पर बड़ी-बड़ी लाल मोहर- तुरंत सूचना दें वरना… जैसी चेतावनी। लेकिन जनाब अमित भगत तो जैसे हवा में तीर चला रहे हों। नोटिस आए और गायब। न हाजिरी, न जवाब, न तौबा। मानो नोटिस कोई लव-लेटर हो, जो पढ़कर जेब में डाल लिया और भूल गए।

जब आवेदक आखिरी बार एसडीओ ऑफिस गया और बोला कि हुजूर अब तो कुछ कीजिए तो वहाँ से जो जवाब आया, उसने सबको हक्का-बक्का कर दिया-  हमारे पास तो इन पर कोई कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है! यानी जिस अधिकारी को कानून ने पच्चीस हजार तक का डंडा घुमाने की खुली छूट दी है, वहीं अधिकारी हाथ खड़े करके कह रहा है- हम तो बस नोटिस लिख सकते हैं, बाकी ऊपर वाले मालिक!

अब आप ही सोचिए। कानून कहता है कि रोज की देरी पर 250 रुपये जुर्माना, कुल पच्चीस हजार तक। बार-बार गड़बड़ करने पर निलंबन की सिफारिश तक। फिर भी एक आईएएस अधिकारी यह कहकर पीछे हट जाए कि हम लाचार हैं तो आम आदमी जाए तो कहाँ जाए?

पर रुकिए, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यहाँ से असली ट्विस्ट आता है। अगर आप भी कभी इस तरह की दीवार से टकराएँ तो सीधे राज्य सूचना आयोग या केन्द्रीय सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाइए। चारों नोटिस की कॉपी, PIO की नाकारा चुप्पी और एसडीओ साहब की ‘हम लाचार हैं’ वाली बात सब साथ लेकर पहुँचिए।

आयोग के पास इतनी ताकत है कि PIO की जेब से पच्चीस हजार निकलवाए, विभाग को चिट्ठी लिखकर सस्पेंड करने की सिफारिश करे, आपको हुई परेशानी का मुआवजा दिलवाए और सूचना फ्री में घर बैठे भिजवाए।

और अगर आयोग भी सो जाए तो? तो चलिए सीधे झारखण्ड हाईकोर्ट। वहाँ तो जज साहबान ऐसे मामलों में आग उगलते हैं। कई बार तो खुद कोर्ट ने अधिकारी को तलब करके पूछा है- ‘कानून पढ़ा है कभी?’

तो अगली बार जब कोई अधिकारी आपको कहे कि ‘कुछ नहीं हो सकता’ तो मुस्कुराइए, फाइल निकालिए और बोलिए- ‘हो सकता है साहब, बहुत कुछ हो सकता है। बस एक क्लिक या एक याचिका दूर है न्याय’। अब PIO हो या FFA, सबकी अकड़ निकलेगी ही। निकालनी ही पड़ेगी।

क्योंकि सूचना का अधिकार कोई रबर का डंडा नहीं जो झुक जाए। यह लोहे का है। जो जितना झुकाने की कोशिश करेगा, उसी का सर फूटेगा। तो डरिए मत, आवाज उठाइए। नाम छुपाना हो तो छुपाइए, पर हक मत छुपाइए। https://jsic.jharkhand.gov.in एक क्लिक दूर है। चलो, अब कोई चुप नहीं रहेगा!

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