हटिया (रांची दर्पण/मुकेश भारतीय)। राजधानी रांची की रफ्तार भरी सड़कों पर एक ऐसा दृश्य (Elephant Strays Ranchi City) सामने आया, जिसने शहर और जंगल दोनों के बीच बढ़ते टकराव की सच्चाई को बेनकाब कर दिया। जंगल का स्वाभाविक निवासी गजराज जब कंक्रीट के जंगल में उतरा तो दहशत केवल शहरवासियों में ही नहीं थी। यह डर दोतरफा था। इंसान के बढ़ते दखल से विचलित हाथी और हाथी की मौजूदगी से सहमे लोग। दोनों ही असुरक्षा के घेरे में दिखे।
तड़के करीब 4.30 बजे एक हाथी सिठियो होते हुए हटिया क्षेत्र में दाखिल हुआ। अल सुबह से लेकर करीब 10.30 बजे तक इलाके में अफरा-तफरी का माहौल रहा। हाथी कभी रिहायशी गलियों में तो कभी मुख्य सड़कों पर विचरण करता दिखा।
कई लोगों ने मोबाइल से वीडियो बनाए, जो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। शहर की सांसें थमी रहीं। लोग घरों में दुबकने लगे, दुकानों के शटर गिरे और सड़कों पर सन्नाटा पसर गया।
कंक्रीट की झाड़ियों में भय, जंगल की पुकारः इस पूरी घटना ने एक कड़वा सवाल खड़ा किया। क्या हम जंगल को इतना संकुचित कर चुके हैं कि गजराज को शहर में उतरना पड़े?
जानकारों के अनुसार जंगलों में मानवीय गतिविधियों के बढ़ने से हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर बाधित हो रहे हैं। नतीजतन भटके हुए हाथी भोजन और सुरक्षित रास्ते की तलाश में शहरी इलाकों तक पहुंच रहे हैं।
वन विभाग की मुस्तैदी, भीड़ की लापरवाहीः हाथी की सूचना मिलते ही वन विभाग की रिस्पॉन्स टीम सक्रिय हुई। 100 से अधिक वनकर्मियों को तैनात किया गया। सिल्ली, बेड़ो, सरायकेला और हजारीबाग से अतिरिक्त टीमें बुलाई गईं।
टीम ने हवाई नगर, बिरसा चौक, हेथू, लटमा रोड, ओबरिया और कोचबोंग के आसपास हाथी की गतिविधियों पर नजर रखी। कोशिश यही रही कि बिना उकसाए सुरक्षित तरीके से हाथी को शहर से बाहर जंगल की ओर मोड़ा जाए।
हालांकि, इस दौरान एक बड़ी चिंता भी सामने आई। कई मोहल्लों से गुजरते वक्त हाथी के पीछे-पीछे लोगों की भीड़ लग गई। कुछ लोग चिल्लाकर दूसरों को घरों में रहने की सलाह दे रहे थे, लेकिन कई जिज्ञासावश हाथी के काफी करीब पहुंच गए।
विशेषज्ञों का कहना है कि भीड़ हाथी को और अधिक तनावग्रस्त कर सकती है, जिससे हादसे का खतरा बढ़ जाता है।
नुकसान सीमित, राहत बड़ीः हाथी जब हटिया स्थित निफ्ट कैंपस में दाखिल हुआ तो वहां की चहारदीवारी का एक हिस्सा गिर गया। इसके बाद वह बिरसा चौक की ओर बढ़ा और एयरपोर्ट की चहारदीवारी से सटे पेड़ों के बीच कुछ देर रुका।
सौभाग्यवश, इस पूरे घटनाक्रम में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। यह राहत की सबसे बड़ी बात रही।
अंततः वन विभाग की रणनीति रंग लाई और हाथी को रिंग रोड होते हुए मेढ़ा जंगल की ओर मोड़ दिया गया। देर शाम तक ग्राउंड टीम उसकी निगरानी करती रही, ताकि वह सुरक्षित तरीके से अपने प्राकृतिक आवास में लौट सके।
दोतरफा खतरे की घंटीः यह घटना महज एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी है। जंगल में इंसानी दखल और शहरों का बेतहाशा विस्तार दोनों ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं।
जरूरत है कि हाथी कॉरिडोर को संरक्षित किया जाए, शहरी सीमा पर सतर्कता बढ़े और आम लोग ऐसी स्थितियों में जिम्मेदारी दिखाएं।
क्योंकि इसमें कोई शक नहीं कि अगर जंगल का गजराज बार-बार शहर की सड़क पर दिखने लगे तो यह केवल दहशत नहीं, हमारे विकास मॉडल पर उठता गंभीर सवाल भी होगा।
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