Kudmi ST Status Protest: एसटी का दर्जा के लिए किसी भी हद तक जायेंगे कुड़मी
Kudmi community rallies for Scheduled Tribe recognition and constitutional status for Kudmali language with warnings of further agitation

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची स्थित प्रभात तारा मैदान उस वक्त राजनीतिक और सामाजिक चेतना (Kudmi ST Status Protest) के बड़े मंच में तब्दील हो गया, जब बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति के बैनर तले आयोजित कुड़मी अधिकार महारैली में हजारों की संख्या में लोग जुटे।
रैली की अध्यक्षता समिति के केंद्रीय अध्यक्ष शीतल ओहदार ने की। मंच से एक स्वर में कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने और कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान देने की मांग उठी।
किसी भी हद तक जाएंगे -शीतल ओहदारः रैली को संबोधित करते हुए शीतल ओहदार ने कहा कि कुड़मी समाज के साथ पिछले 75 वर्षों से ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। उन्होंने 6 सितंबर 1950 का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व और कॉरपोरेट घरानों की मिलीभगत से कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर कर पिछड़ा वर्ग में डाल दिया गया।
उनका दावा था कि झारखंड की धरती के भीतर मौजूद खनिज संपदा ही इस निर्णय की मूल वजह रही। हमारे पास जमीन थी, जमीन के नीचे खनिज था, इसलिए हमें हमारे मूल अधिकार से वंचित किया गया। यदि जल्द निर्णय नहीं हुआ तो आंदोलन और उग्र होगा।
लोकुर कमेटी का संदर्भ और ताजा उदाहरणः रैली में वक्ताओं ने लोकुर कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए कहा कि कुड़मी समाज एसटी की सभी मानकों को पूरा करता है। मंच से यह भी कहा गया कि हाल के वर्षों में अन्य जातियों को अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल किया गया, लेकिन कुड़मी समाज की मांग लंबित है।
पूर्व विधायक डॉ. लंबोदर महतो ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अविलंब निर्णय नहीं लिया गया तो पूरे झारखंड में अनिश्चितकालीन आर्थिक नाकेबंदी की जाएगी। यह बयान राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर सकता है।
महिला नेतृत्व और सामाजिक सुधार का एजेंडाः समिति की महिला अध्यक्ष सुषमा महतो ने कहा कि कुड़मी झारखंड का सबसे अधिक आबादी वाला जनजातीय समाज है, फिर भी विकास की मुख्यधारा से दूर है।
उन्होंने समाज के भीतर सुधार के एजेंडे की भी घोषणा की। जिनमें अनावश्यक जमीन बिक्री पर रोक के लिए जागरूकता अभियान, नशापान और दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक आंदोलन, युवाओं को उन्नत कृषि और व्यवसाय की ओर प्रेरित करना, आगामी जनगणना में जाति ‘कुड़मी’ और भाषा ‘कुड़माली’ दर्ज कराने का अभियान शामिल है।
जोकि यह संकेत देता है कि आंदोलन केवल राजनीतिक मांग तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक पुनरुत्थान की दिशा में भी केंद्रित है।
युवाओं की भूमिका और शिक्षा पर जोरः छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने कहा कि समाज के सर्वाधिक युवा आज बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। उन्होंने समाज के हर बच्चे को उच्च शिक्षा की ओर प्रेरित करने और बुद्धिजीवियों की टीम बनाकर मार्गदर्शन तंत्र विकसित करने की घोषणा की।
शिक्षाविद डॉ. अमर कुमार चौधरी और बगोदर विधायक नागेंद्र महतो समेत कई नेताओं ने भी अपने विचार रखे। मंच से बार-बार यह संदेश दिया गया कि आंदोलन शांतिपूर्ण लेकिन निर्णायक होगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव: क्या बदलेगा समीकरण? झारखंड की राजनीति में जनजातीय पहचान और आरक्षण का सवाल हमेशा संवेदनशील रहा है। ऐसे में कुड़मी समाज की यह व्यापक लामबंदी आने वाले चुनावी परिदृश्य को प्रभावित कर सकती है। यदि आर्थिक नाकेबंदी जैसी चेतावनी पर अमल होता है तो इसका असर उद्योग, खनन और परिवहन पर पड़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह रैली केवल मांगों की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि संगठित शक्ति प्रदर्शन है। इसका उद्देश्य राज्य और केंद्र सरकार पर दबाव बनाना है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है। स्रोतः मुकेश भारतीय/मीडिया रिपोर्ट





