
रांची दर्पण डेस्क। झारखंड हाईकोर्ट ने साइबर ब्लैकमेल और महिला की निजता के गंभीर उल्लंघन से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यह मामला महज निजी संबंधों के टूटने का नहीं, बल्कि एक महिला की गरिमा, उसकी निजता और सामाजिक सम्मान को ठेस पहुंचाने के आरोपों से जुड़ा है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अदालत ने कहा कि डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग कर किसी की छवि धूमिल करना समाज और कानून दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
निजता पर हमला गंभीर अपराध
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया सामने आये आरोप यह संकेत देते हैं कि पीड़िता की निजी तस्वीरों और सोशल मीडिया पहचान का कथित दुरुपयोग किया गया।
अदालत ने यह भी माना कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल आईटी अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन है, बल्कि भारतीय दंड संहिता के तहत भी गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि किसी महिला की अनुमति के बिना उसकी निजी तस्वीरों को प्रसारित करना उसके मौलिक अधिकारों पर सीधा आघात है।
क्या हैं आरोप?
मामले में पीड़िता ने शिकायत दर्ज करायी है कि आरोपी के साथ उसके पिछले कुछ वर्षों से संबंध थे। बाद में संबंध बिगड़ने के बाद आरोपी ने कथित रूप से बदले की भावना से उसके नाम पर फर्जी ई-मेल आईडी और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया।
शिकायत के अनुसार इन फर्जी अकाउंट्स के माध्यम से पीड़िता की आपत्तिजनक तस्वीरें और निजी संदेश प्रसारित किये गये। पीड़िता का आरोप है कि यह सब उसकी सहमति के बिना किया गया।
इतना ही नहीं, पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने तस्वीरें और निजी जानकारी सार्वजनिक करने की धमकी देकर उससे 25 लाख रुपये की मांग की। साथ ही उस पर अपने पति से तलाक लेने का दबाव भी बनाया गया।
शिकायत के अनुसार यह पूरी कार्रवाई उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करने और सामाजिक रूप से अपमानित करने के उद्देश्य से की गयी।
विवाहित और समझदार महिला वाला तर्क खारिज
अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया कि पीड़िता एक विवाहित और समझदार महिला है तथा दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे।
अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति या उसकी समझदारी का हवाला देकर आरोपी अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त नहीं हो सकता।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सहमति का अर्थ यह नहीं कि कोई व्यक्ति भविष्य में उस भरोसे का दुरुपयोग करे या निजी सामग्री को हथियार बनाकर ब्लैकमेलिंग करे। अदालत ने कहा कि यह सोच कि ‘रिश्ता था, इसलिए सब जायज़ था’ कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है।
अग्रिम जमानत क्यों ठुकराई गई?
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अग्रिम जमानत एक असाधारण राहत है, जिसे सामान्य परिस्थितियों में नहीं दिया जाना चाहिए। खासकर तब, जब आरोप गंभीर हों और जांच प्रभावित होने की आशंका हो। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि डिजिटल सबूतों से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने देना जरूरी है।
न्यायालय का मानना था कि यदि आरोपी को अग्रिम जमानत दी जाती है, तो वह इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकता है या गवाहों को प्रभावित कर सकता है। इस आशंका को ध्यान में रखते हुए अदालत ने विजय श्रीवास्तव की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
साइबर अपराध और कानून की बढ़ती चुनौती
यह मामला एक बार फिर इस बात की ओर इशारा करता है कि निजी रिश्तों के टूटने के बाद डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बदले के हथियार के रूप में किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया, क्लाउड स्टोरेज और मैसेजिंग ऐप्स के दौर में निजी तस्वीरें और चैट्स गलत हाथों में पड़ने पर गंभीर मानसिक, सामाजिक और कानूनी संकट खड़ा कर सकती हैं।
आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 66E (निजता का उल्लंघन) और धारा 67 व 67A (अश्लील सामग्री के प्रकाशन/प्रसारण) जैसे प्रावधान ऐसे मामलों में लागू होते हैं। इसके अलावा, भारतीय दंड संहिता की धारा 354C (वॉयूरिज्म), 499/500 (मानहानि), 503/506 (आपराधिक धमकी) जैसी धाराएं भी परिस्थितियों के अनुसार लगाई जा सकती हैं।
डिजिटल अपराध भी वास्तविक अपराध
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऑनलाइन अपराधों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति खतरनाक है। न्यायालय ने कहा कि सोशल मीडिया पर की गई हरकतें भी उतनी ही गंभीर हैं जितनी वास्तविक दुनिया में की गईं आपराधिक गतिविधियां। किसी की छवि खराब करना, उसकी निजी तस्वीरें फैलाना या उसे ब्लैकमेल करना, सब कानून की नजर में दंडनीय है।
यह टिप्पणी खास तौर पर युवाओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी जा रही है कि डिजिटल स्पेस कानून से परे नहीं है।
पीड़िता की गरिमा सर्वोपरि
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू पीड़िता की गरिमा और मानसिक स्थिति है। न्यायालय ने माना कि निजी तस्वीरों के वायरल होने की आशंका मात्र से भी किसी महिला पर गहरा मानसिक दबाव पड़ सकता है। सामाजिक बदनामी का डर, पारिवारिक तनाव और मानसिक आघात ऐसे अपराधों के वास्तविक परिणाम हैं।
अदालत का यह रुख महिलाओं की निजता के अधिकार को मजबूत कानूनी संरक्षण देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
समाज और कानून के लिए संकेत
कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला उन लोगों के लिए स्पष्ट संदेश है जो निजी रिश्तों के टूटने के बाद निजी तस्वीरों या चैट्स को बदले के औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अदालत ने साफ कर दिया है कि ‘कभी सहमति थी’ का मतलब ‘हमेशा सहमति रहेगी’ नहीं होता। किसी भी निजी सामग्री को साझा करने से पहले स्पष्ट अनुमति आवश्यक है, अन्यथा यह गंभीर अपराध बन सकता है।
निजता की रक्षा पर न्यायपालिका सख्त
झारखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय डिजिटल युग में निजता के अधिकार की रक्षा को लेकर न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि साइबर ब्लैकमेलिंग और निजी सामग्री के दुरुपयोग जैसे मामलों में कानून सख्ती से लागू होगा।
अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर अदालत ने यह संकेत दिया है कि जांच को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से आगे बढ़ने दिया जाएगा। आने वाले दिनों में यह मामला साइबर अपराध से जुड़े कानूनी विमर्श में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
( रांची दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय का समाचार विश्लेषण )










