प्रशासनआस-पासफीचर्डसमस्या

मानव तस्करीः अब भी कमरे की दीवारों में कैद अंश-अंशिका तक नहीं पहुंची CM की घोषणाएं

रांची में मानव तस्करी से मुक्त कराए गए दो छोटे बच्चे अब भी मानसिक आघात से जूझ रहे हैं। सरकारी योजनाओं के वादे, लेकिन मदद का इंतजार जारी।

रांची दर्पण डेस्क। मानव तस्करी की भयावह सच्चाई का एक और चेहरा हाल ही में झारखंड की राजधानी रांची में देखने को मिला, जब पुलिस ने पाँच वर्षीय अंश कुमार और उसकी चार साल की बहन अंशिका कुमारी को तस्करों के चंगुल से सकुशल बरामद किया। 14 जनवरी को रामगढ़ जिला के चितरपुर क्षेत्र से हुई यह बरामदगी सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं थी, बल्कि दो मासूम जिंदगियों को अंधेरे से निकालकर फिर से उम्मीद की रोशनी में लाने की कोशिश थी।

इस सफलता पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड पुलिस को बधाई दी और जिला प्रशासन को बच्चों के परिवार को हर संभव सरकारी योजना से जोड़ने का निर्देश भी दिया। लेकिन सरकारी घोषणाओं और जमीनी सच्चाई के बीच की दूरी आज भी अंश और अंशिका के घर की खामोश दीवारों में साफ महसूस की जा सकती है।

सामान्य नहीं हो पाए हैं घर लौटे बच्चे

29 जनवरी को जब हमारी टीम बच्चों के घर पहुँची, तो दरवाजे पर उनके पिता सुनील मिले। चेहरे पर राहत भी थी, लेकिन चिंता की गहरी लकीरें उससे कहीं ज्यादा साफ दिख रही थीं। घर के अंदर छोटे से कमरे में अंश और अंशिका अपनी मां नीतू कुमारी के पास बैठे थे। दोनों बच्चे चुप थे, अनजान लोगों को देखकर सहम जा रहे थे।

सुनील बताते हैं कि बच्चे अब भी बहुत डरे हुए हैं। बाहर जाने का नाम नहीं लेते। दरवाजे की तरफ देखते ही सहम जाते हैं। पहले गली में खेलते थे, अब कमरे से बाहर नहीं निकलते।

मां नीतू की आंखें भर आती हैं। वह धीरे से कहती हैं कि रात में कई बार उठकर रोते हैं। कुछ पूछो तो चुप हो जाते हैं। जैसे अंदर ही अंदर कुछ दबा रखा हो। यह सिर्फ शारीरिक रूप से लौट आने की कहानी नहीं है, बल्कि मानसिक आघात से जूझते दो मासूमों की खामोश जंग है।

पुलिस कार्रवाई बनी उम्मीद की किरण

पुलिस सूत्रों के अनुसार बच्चों की बरामदगी एक सूचना के आधार पर की गई। मानव तस्करों का गिरोह बच्चों को बहला-फुसलाकर ले जाने की फिराक में था। समय रहते पुलिस ने छापेमारी कर दोनों बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

इस कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड पुलिस की सराहना करते हुए कहा था कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस मामले में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

उन्होंने रांची के डीसी मंजूनाथ भजंत्री को निर्देश दिया था कि बच्चों के परिवार को तुरंत सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाए, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियाँ दोबारा न बनें।

सरकार की इस तत्परता ने परिवार को एक उम्मीद जरूर दी, लेकिन अब सवाल यह है कि ये वादे कितनी तेजी से जमीन पर उतरते हैं।

योजनाओं का वादा, लेकिन इंतजार जारी

सुनील बताते हैं कि बरामदगी के कुछ दिनों बाद प्रशासनिक अधिकारी उनके घर आए थे। बच्चों का स्कूल में मुफ्त दाखिला कराया जाएगा। हमें रोजगार के साधन दिए जाएंगे। आवास योजना का लाभ मिलेगा। राशन कार्ड और आधार कार्ड भी बनवाया जाएगा।

लेकिन हकीकत फिलहाल इतनी ही है कि सिर्फ आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। वे गरीब लोग हैं। रोज कमाकर खाते हैं। बच्चों के साथ जो हुआ, उसके बाद काम पर भी ठीक से नहीं जा पा रहे। अगर मदद जल्दी मिलती तो सहारा मिलता।

परिवार किराये के एक छोटे से मकान में रहता है। आय का स्थायी स्रोत नहीं है। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ उनके लिए सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि जीवनरेखा जैसा है।

राज्य से बाहर का मूल निवास बनी अड़चन

जब इस संबंध में जिला प्रशासन की दलील है कि परिवार मूलतः बिहार का निवासी है। इसी वजह से झारखंड सरकार की कुछ योजनाओं से सीधे जोड़ने में तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं।

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हम कोशिश कर रहे हैं कि बच्चों को अधिकतम संभव लाभ मिले। कुछ योजनाएं निवास प्रमाण पर निर्भर करती हैं। फिर भी मानवीय आधार पर जो संभव होगा, किया जाएगा।

यह जवाब प्रशासनिक दृष्टि से सही हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मानव तस्करी जैसे गंभीर अपराध के पीड़ित बच्चों के मामले में राज्यों की सीमाएँ इतनी बड़ी बाधा बननी चाहिए?

मानसिक आघात अदृश्य लेकिन गहरा घाव

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसे मामलों में सिर्फ बरामदगी ही पर्याप्त नहीं होती। असली चुनौती उसके बाद शुरू होती है।

रांची की एक सामाजिक कार्यकर्ता बताती हैं कि तस्करी के शिकार बच्चों में गहरा मानसिक डर बैठ जाता है। वे लोगों पर भरोसा करना छोड़ देते हैं। सही काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग न मिले तो यह असर लंबे समय तक रह सकता है।

अंश और अंशिका के व्यवहार में भी यही लक्षण दिख रहे हैं।  चुप्पी, डर, बाहर जाने से इनकार, रात में घबराहट। लेकिन अब तक परिवार को किसी मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद नहीं मिली है। यह एक बड़ा खालीपन है, जिसे भरना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

गरीबी और असुरक्षा तस्करों का सबसे बड़ा हथियार

मानव तस्करी के ज्यादातर मामलों में एक बात कॉमन होती है गरीबी, असुरक्षा और जानकारी की कमी। सुनील का परिवार भी इन्हीं हालात से गुजर रहा था।

सुनील कहते हैं कि काम की तलाश में हम लोग इधर-उधर जाते रहते हैं। बच्चे घर के बाहर खेलते थे। कौन ले गया, कैसे ले गया, कुछ समझ ही नहीं आया। तस्कर अक्सर ऐसे ही परिवारों को निशाना बनाते हैं, जहां माता-पिता रोजी-रोटी की जद्दोजहद में उलझे रहते हैं और बच्चों पर लगातार निगरानी संभव नहीं होती।

यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज को चेतावनी भी है कि जागरूकता और सतर्कता कितनी जरूरी है।

सामान्य जीवन की ओर वापसी सबसे बड़ी चुनौती

बच्चों की सुरक्षित बरामदगी के बाद अगला बड़ा कदम उन्हें सामान्य जीवन में वापस लाना होता है। स्कूल इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन अंश और अंशिका के मामले में यह रास्ता भी आसान नहीं दिख रहा।

सुनील बताते हैं कि अभी तो बच्चे घर से बाहर निकलने को तैयार नहीं। स्कूल कैसे भेजेंगे? पहले उनका डर दूर करना होगा।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे बच्चों के लिए विशेष देखभाल, धीरे-धीरे सामाजिक माहौल में वापसी और शिक्षकों की संवेदनशील भूमिका जरूरी होती है। सिर्फ नामांकन करवा देना काफी नहीं है।

सरकार, समाज और सिस्टम की संयुक्त जिम्मेदारी

इस पूरे मामले ने एक बार फिर दिखाया है कि मानव तस्करी के खिलाफ लड़ाई सिर्फ पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। यह बहुस्तरीय प्रयास मांगती है और वह है पुलिस की सतर्कता, प्रशासन की संवेदनशीलता, समाज की जागरूकता एवं पीड़ित परिवारों के पुनर्वास की ठोस व्यवस्था।

मुख्यमंत्री का निर्देश एक सकारात्मक कदम है, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब योजनाओं का लाभ समय पर और बिना जटिल प्रक्रियाओं के जरूरतमंदों तक पहुंचे।

मासूम चेहरों की खामोश अपील

अंश और अंशिका अभी इतने छोटे हैं कि वे अपने साथ हुए अनुभव को शब्दों में नहीं बता सकते। लेकिन उनकी खामोशी, सहमी निगाहें और कमरे से बाहर न निकलने की जिद बहुत कुछ कहती है।

यह कहानी सिर्फ एक रेस्क्यू ऑपरेशन की सफलता नहीं, बल्कि उस लंबी राह की शुरुआत है, जिसमें इन बच्चों को फिर से भरोसा करना सीखना है लोगों पर, दुनिया पर और अपने भविष्य पर।

सरकार के वादे, प्रशासन की कोशिशें और समाज का सहयोग अगर सही दिशा में मिल जाए तो शायद एक दिन ये दोनों बच्चे फिर से गली में खेलते नजर आएं बिना डर के और बिना सहमे हुए। फिलहाल, उनकी दुनिया उस छोटे से कमरे तक सिमटी है। जहां वे सुरक्षित तो हैं, लेकिन अब भी आजाद नहीं।

( रांची दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय की विशेष रिपोर्ट )

Ranchi Darpan

वरीय पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों पर गहरी समझ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। उनका उद्देश्य ताज़ा खबरें, विश्वसनीय रिपोर्टिंग और प्रासंगिक दृष्टिकोण को पाठकों तक ईमानदारी से पहुँचाना है। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित राँची दर्पण (Ranchi Darpan) के माध्यम से वे राजधानी राँची और उसके आसपास से जुड़ी स्थानीय खबरें, प्रशासनिक मुद्दे एवं राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। वे मानते हैं कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.