रांची में यूं दम तोड़ रहा RTI, जिम्मेवार के आगे अपीलीय प्राधिकार बौना ! 

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम-2005 को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाने का दावा किया जाता है, लेकिन झारखंड की राजधानी रांची के कांके अंचल में यह कानून महज कागजों तक सिमट गया लगता है। एक साधारण नागरिक की जद्दोजहद ने प्रशासनिक लापरवाही का काला चेहरा उजागर कर दिया है।

पिछले पांच महीनों से आवश्यक सूचना के लिए दर-दर भटक रहे इस नागरिक को न तो अंचलाधिकारी से जवाब मिला, न ही अपीलीय प्राधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी (अपील वाद संख्या-127/25 के आदेशों का अब तक पालन हुआ। अब सवाल उठ रहा है कि क्या RTI कानून सिर्फ आम आदमी की आवाज दबाने का हथियार है?

मामला कांके अंचल के एक निवासी का है, जिन्होंने अप्रैल 2025 में कांके अंचलाधिकारी को RTI अधिनियम-2005 के तहत एक साधारण आवेदन दाखिल किया। आवेदन में मांगी गई सूचना उनकी ‘जीवन यापन’ से सीधे जुड़ी थी। एक ऐसा दावा जो दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से दर्ज है। लेकिन अंचलाधिकारी ने न तो समय सीमा के अंदर जवाब दिया और न ही कोई सूचना उपलब्ध कराई। यह लापरवाही तब और गंभीर हो गई जब नागरिक ने मई 2025 में अपीलीय प्राधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी के समक्ष नियमबद्ध अपील प्रस्तुत की।

दस्तावेजों के अनुसार अपीलीय प्राधिकारी ने कांके अंचलाधिकारी को तीन अलग-अलग नोटिस जारी किए पहला 17 जून 2025 को, दूसरा 1 जुलाई 2025 को और तीसरा 30 अगस्त 2025 को। इन नोटिसों में स्पष्ट निर्देश थे कि संबंधित सूचना 15 दिनों के अंदर उपलब्ध कराएं। लेकिन अफसोस कि न तो अपीलीय प्राधिकारी को कोई जवाब मिला और न ही आवेदक को।

पीड़ित नागरिक ने अब अपीलीय प्राधिकारी को एक पत्र लिखा है, जिसमें कड़वी सच्चाई बयां की गई है। पत्र में कहा गया कि मैंने कांके अंचलाधिकारी से सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत जानकारी मांगी थी। लेकिन उन्होंने कोई सूचना उपलब्ध नहीं कराई। उसके बाद बतौर अपीलीय पदाधिकारी आपके समक्ष नियमबद्ध आवेदन प्रस्तुत किया। जहां तक मुझे आपके कार्यालय से जानकारी के तौर पर कांके अंचालाधिकारी के नाम तीन नोटिश की प्रति उपलब्ध कराई गई है, जिसके तहत भी न आपके समक्ष और न ही मुझे सूचना उपलब्ध कराई गई है। जबकि यह सूचना मेरी जीवन यापन से जुड़ी है।

नागरिक ने आगे सवाल दागे हैं कि अब वह आगे अपील में जाने से पहले आपसे यह जानना चाहता है कि यदि आपके स्तर से तीन आदेश का पालन यदि संबंधित प्राधिकार नहीं करता है तो क्या आपके स्तर क्या कोई कार्रवाई करने का प्रावधान है? या सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत कोई अधिकार प्रदत है? आखिर कांके अंचल कार्यालय/ अंचलाधिकारी द्वारा पिछले 5 माह से आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराने के पिछे मंशा क्या है?

यह पत्र न सिर्फ एक व्यक्तिगत शिकायत है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है। RTI एक्ट की धारा 20 के तहत यदि सूचना अधिकारी जानबूझकर सूचना नहीं देता तो जुर्माना (250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये) और अनुशासनिक कार्रवाई का प्रावधान है। लेकिन जमीनी हकीकत? शून्य। केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में झारखंड में RTI अपीलों का निपटारा दर मात्र 20% रहा, जो राष्ट्रीय औसत से 75% कम है।

पूर्व सूचना आयुक्त राजेश कुमार सिंह कहते हैं कि यह कोई पहला मामला नहीं है। कांके जैसे अंचलों में कर्मचारी RTI को बोझ मानते हैं। तीन नोटिस के बावजूद कार्रवाई न होना अपीलीय प्राधिकारी की कमजोरी दर्शाता है। नागरिक को राज्य सूचना आयोग जाना चाहिए। जहां धारा 18-19 के तहत मजबूत अपील का अधिकार है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या आम आदमी के पास इतना समय और संसाधन होता है? यहां पर यह भी स्पष्ट है कि पिछले तीन साल से झारखंड राज्य सूचना आयोग का गठन नहीं हो सका है। जोकि सरकार की मंशा पर भी सबाल उठाता है और उसी सबाल का लाभ लोक सेवक उठा रहे हैं।

दूसरी ओर झारखंड RTI मंच की संयोजिका मीरा देवी ने ‘रांची दर्पण’ से बातचीत में कहा कि  महिलाओं और गरीबों के मामले में सूचना छिपाना एक बड़ी साजिश हो सकती है। यह जीवन यापन से जुड़ी सूचना है। शायद भूमि, राशन या सरकारी योजना से। प्रशासन को जवाबदेह बनाना होगा। इस तरह RTI का मजाक उड़ाया जाना प्रशासनिक व्यवस्था पर एक कलंक है।

हालांकि अब यह मामला रांची के कलेक्ट्रेट से लेकर झारखंड के मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल तक गूंज सकता है। क्योंकि अंचलाधिकारी पर जुर्माना, अपीलीय प्राधिकारी से स्पष्टीकरण और नागरिक को सूचना, और यदि यह अनदेखा हुआ तो RTI सिर्फ कागज पर बनेगा, बल्कि आम नागरिक का विश्वास भी टूटेगा। खासकर उस स्थिति में जब सरकार में शामिल कांगेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी शासन में पारदर्शिता के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम लागू करने अपनी बड़ी उपलब्धि होने का दावा करती है।

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