Saturday, February 21, 2026
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    पेसा नियमावली की अधिसूचना जारी, समझें कितना बदलेगा गांव

    रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में अब गांव की मर्जी चलेगी। राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों में अब तक जो फैसले कागजों और दफ्तरों में होते थे, वह अब चौपाल में होंगे। पेसा नियमावली की अधिसूचना जारी होते ही आदिवासी इलाकों की राजनीति और प्रशासन का चेहरा बदल गया।

    अब गांव के कैटेगरी-1 के बालू घाट (पांच हेक्टेयर से कम) से लेकर जमीन की खरीद-बिक्री, शराब दुकान खोलने से लेकर जंगल के उत्पाद बेचने तक का फैसला अफसर नहीं, ग्राम सभा करेगी। जिस स्वशासन की बात आदिवासी समाज दशकों से करता रहा, वह पहली बार नियमों की शक्ल में जमीन पर उतरता दिख रहा है।

    अब गांव की बैठक सिर्फ औपचारिकता नहीं होगी। हर महीने ग्राम सभा की बैठक होगी। इसमें महिलाओं की मौजूदगी अनिवार्य होगी और फैसले खुले में होंगे। गांव के छोटे-मोटे विवाद सुलझाने का अधिकार भी अब ग्राम सभा के पास होगा।

    सरकार का दावा है कि यह नियमावली आदिवासी इलाकों में सत्ता का संतुलन बदल देगी। जहां अब तक बाहरी एजेंसियों और ठेकेदारों का दबदबा था, वहां गांव खुद अपने संसाधनों का मालिक बनेगा।

    कैबिनेट ने इस नियमावली को 23 दिसंबर को कुछ बदलावों के साथ मंजूरी दी थी। अब इसकी अधिसूचना जारी होने के बाद झारखंड उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जहां पेसा सिर्फ कानून नहीं, नियमों के साथ लागू हुआ है।

    पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि राज्य में पेसा नियमावली लागू हो गई है। स्वशासन लागू करना सरकार की प्राथमिकता है।

    पेसा कानून अनुसूचित क्षेत्र में ग्राम सभा को प्रशासन, संसाधन और परंपराओं पर निर्णय लेने का अधिकार देता है। झारखंड इसके लागू होने से अब ग्राम सभा सबसे ताकतवर इकाई बन गई है।

    हर महीने कम से कम एक बैठक अनिवार्य होगी। इसके लिए एक तिहाई का कोरम जरूरी होगा। इनमें भी एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य होगी। बैठक सार्वजनिक रूप से करनी होगी। अगर बंद भवन में करनी है तो दरवाजा खुला रखना होगा। किसी को भी प्रवेश से नहीं रोक सकेंगे।

    इसकी अध्यक्षता उसी ग्राम सभा के अनुसूचि जनजाति के कोई ऐसे सदस्य होंगे, जो रीति- रिवाजों के साथ मान्यता प्राप्त व्यक्ति हो।

    कैटेगरी-1 (पांच हेक्टेयर से कम) के बालू घाट का संचालन ग्राम सभा करेगी। उठाव बालू से मिलने वाला शुल्क ग्राम सभा के कोष में जाएगा। यहां जेसीबी से खनन पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। एनजीटी के निर्देश के अनुरूप मानसून में बालू पर पूरी तरह से रोक रहेगी।

    ग्राम सभा की अनुमति के बिन न शराब की दुकान खुलेगी, न ही फैक्ट्री । महुआ, हड़िया जैसी पारंपरिक पेय सिर्फ घरेलू और सामाजिक उपयोग के लिए होगा। शराब नियंत्रण में महिलाओं की निर्णायक भूमिका होगी।

    पारिवारिक और जमीन विवाद ग्राम सभा में सुलझाए जाएंगे। ग्राम सभा अधिकतम 2000 रुपए तक जुर्माना लगा सकेगा। लेकिन उसे जेल भेजने का अधिकार नहीं होगा। लेकिन अगर कोई आरोपी अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगता है और दोबारा गलती न करने का प्रण लेता है तो उसे ही दंड मान लिया जाएगा।

    पुलिस अगर किसी मामले में किसी को तत्काल गिरफ्तार करती है तो 7 दिन के भीतर सूचना ग्राम सभा को देनी होगी ।

    सीएनटी-एसपीटी एक्ट से जुड़े मामलों में ग्राम सभा की सहमति जरूरी होगी। आदिवासी जमीन पर सीएनटी की धारा 71 का उल्लंघन कर कोई कब्जा कर लेता है या धारा 46 या धारा 48 या 239 का उल्लंघन करके कपट पूर्ण तरीके से ले लेता है तो ऐसी जमीन से उसे बेदखल किया जा सकेगा।

    इसके बदले कब्जाधारी को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं मिलेगा। संबंधित जमीन मूल रैयत या उसके वारिस को सौंपा जाएगा। अगर कोई वारिस न हो तो वह जमीन दूसरे आदिवासी रैयत के नाम बंदोबस्त किया जाएगा। हर साल 15 अप्रैल तक रजिस्टर-2 की कॉपी ग्राम सभा को उपलब्ध करानी होगी।

    ग्राम सभा को अब वास्तविक अधिकार मिल जाएंगे। जल-जंगल और जमीन का अधिकार। ग्राम सभा के पारंपरिक अधिकार अब वैधानिक अधिकार के तौर पर लागू करने के लिए प्रशासन बाध्य होगा। ग्राम सभा के गठन का अधिकार सरकार और प्रशासन को नहीं दिया गया है। जो परंपरागत ग्राम सभा की मान्यता है, वही लागू होगी। इनमें जनसंख्या का कोई मतलब नहीं है। अनुसूचित क्षेत्रों में विकास भी ग्राम सभा के अधीन होगा।

    खास बात यह है कि ग्राम सभा स्थाई होगी, क्योंकि यह पारंपरिक ग्राम सभा है। इसे कभी भंग नहीं किया जा सकेगा। एक-एक योजना ग्राम सभा की अनुमति से ही उस राजस्व ग्राम में लाया जाएगा। यहां तक कि कोई भी छोटी-बड़ी कंपनियां बिना ग्राम सभा के जमीन तक नहीं ले सकती है।

    पेसा का मूल उद्देश्य ही पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में निवास करने वाले ग्रामीणों को अधिकार देना और ग्राम सभा को सशक्त करना है। ग्राम कोष का गठन होगा। जो भी आय होगी, पंचायत समिति उसका 80 प्रतिशत ग्राम कोष में डालेगी अौर 20 प्रतिशत पंचायत समिति के पास होगा। तीन व्यक्ति तीन साल के लिए मनोनीत होंगे, जो ग्राम कोष का संचालन करेंगे।

    मिट्टी, पत्थर, बालू और मोरम सहित उस क्षेत्र में पाए जाने वाले लघु खनिज का उपयोग पूरी तरह इसके अधीन होगा। सिंचाई का प्रबंधन, ग्राम स्तर पर होने वाले वनोत्पाद एवं अन्य उत्पाद पर इनका अधिकार होगा। वन्य जीव के संरक्षण का काम भी ग्राम सभा को ही मिलेगा।

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