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पत्रकारिता का बोझ तले दब गया सच, अलविदा शुभेच्छुओं, मर गया हूं मैं?

-: मुकेश भारतीय :-

मैं एक पत्रकार हूँ। कम से कम कागज़ों पर। परिचय में और पुराने परिचितों की याद में। पर आज की हकीकत यह है कि मेरी पत्रकारिता से न मेरा परिवार खुश है, न रिश्तेदार, न जीवन साथी और सच कहूँ तो अब तो बच्चे भी यही मानने लगे हैं कि मैं दुनिया का सबसे तुच्छ काम कर रहा हूँ। उनकी नजर में मैं वह आदमी हूँ, जो अपनी ही बनाई लड़ाई में उलझा है, जहाँ जीत का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं और हार रोज़-रोज़ मिलती है।

वे पूछते नहीं, पर उनके चेहरे पर लिखा होता है कि जब सब 25 को 37 मानकर आगे बढ़ रहे हैं तो आपको ही क्यों 25 को 25 साबित करना है? और मैं उनके इस सवाल का जवाब भी नहीं दे पाता, क्योंकि सच का जवाब अक्सर तर्क से नहीं, जिद से दिया जाता है और वही जिद आज मेरे गले का पत्थर बन गई है।

कांके रांची का यह पूरा प्रकरण अब जमीन से ज्यादा मेरे भीतर चल रही लड़ाई का आईना बन चुका है। एक तरफ DCLR का आदेश है। स्पष्ट, सीधा और कागज़ पर पूरी ताकत के साथ मौजूद। दूसरी तरफ वही आदेश हवा में तैरता हुआ दिखता है, क्योंकि जमीन पर उसका कोई असर नहीं।

निरस्त जमाबंदी जिंदा है, रसीद भी कट रही है और सिस्टम बड़ी सहजता से यह सब प्रक्रिया कहकर आगे बढ़ रहा है। मैं बार-बार वही सवाल लेकर खड़ा होता हूँ कि आदेश का पालन क्यों नहीं?” और हर बार मुझे जवाब मिलता है कि पहले नोटिस का जवाब दीजिए। यह वही जगह है जहाँ सच और सिस्टम आमने-सामने नहीं, बल्कि एक-दूसरे के आसपास घूमते रहते हैं, जैसे किसी को सीधे टकराने से डर हो।

आज हालत यह हो गई है कि मैं खुद को उस कुत्ते की तरह महसूस करने लगा हूँ, जो हड्डी चबाते-चबाते अपने ही मुँह से निकले खून को स्वाद समझ बैठता है। सच की यह लड़ाई भी वैसी ही है- दर्द मेरा, मेहनत मेरी और जो संतोष है, वह भी शायद एक भ्रम ही है।

बाहर से देखने वालों को यह जिद बेवकूफी लगती है, और भीतर से देखने पर यह मजबूरी लगती है। शायद इसी को लोग कहते हैं कि अपने ही जाल में फँस जाना।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहाँ कोई खुलकर गलत नहीं दिखता और कोई पूरी तरह सही भी नहीं दिखता।

हर कोई प्रक्रिया में है, हर कोई अपनी जगह “ठीक” है। अंचल अधिकारी कहता है काम कर रहा हूँ,  जाच एजेंसी कहती है-जांच चल रही है और मैं खड़ा हूँ एक कागज़ और कुछ रिकॉर्डिंग्स के साथ, जैसे किसी पुराने जमाने का आदमी डिजिटल दुनिया में न्याय ढूंढ रहा हो।

कभी-कभी लगता है कि समस्या की जड़ जमीन में नहीं, बल्कि उस सोच में है जहाँ आदेश का पालन करना प्राथमिकता नहीं, बल्कि विकल्प बन चुका है। और मठ्ठा डालने वाला कोई नहीं, क्योंकि हर किसी को लगता है कि यह जिम्मेदारी किसी और की है।

और फिर भी इस पूरे अराजक संतुलन के बीच एक जिद जिंदा है दशरथ मांझी वाली जिद। फर्क बस इतना है कि वहाँ पहाड़ पत्थर का था, यहाँ सिस्टम का है। वहाँ हथौड़ा चलता था, यहाँ आवेदन, शिकायत और रिकॉर्डिंग चलती है। और शायद सबसे बड़ा फर्क यह है कि वहाँ रास्ता दिखता था, यहाँ सिर्फ रास्ते का वादा है।

लेकिन जिद वही है कि जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं। चाहे यह लड़ाई अंचल कार्यालय से निकलकर किसी जांट एजेंसी तक जाए, कोर्ट तक जाए और जरूरत पड़ी तो देश के प्रथम नागरिक तक दस्तक दे, अब यह रुकने वाली नहीं है। क्योंकि अब यह जमीन की लड़ाई कम, और अपने ही अस्तित्व को सही साबित करने की लड़ाई ज्यादा हो चुकी है।

लेकिन इस जिद की कीमत भी कम नहीं है। घर में खामोशी बढ़ती जा रही है, रिश्तों में दूरी और भीतर एक अजीब सा खालीपन। लोग कहते हैं कि छोड़ दीजिए, क्या मिलेगा? और मैं सोचता हूँ कि अगर छोड़ दिया तो बच क्या जाएगा?” शायद यही वह मोड़ है, जहाँ आदमी पत्रकार नहीं रहता, सिर्फ एक जिद बन जाता है। और समाज को जिद्दी लोग कभी पसंद नहीं आते। उन्हें या तो पागल कहा जाता है या बेकार।

कांके, जो कभी पागलखाने के लिए मशहूर था, आज मुझे एक अलग ही प्रतीक लगता है। यहाँ तर्क पागल लगता है और विसंगति सामान्य। यहाँ 25 का 37 होना असामान्य नहीं, बल्कि “एंट्री” है। और जो इस एंट्री पर सवाल उठाए, वह या तो परेशान है, या फिर… मेरे जैसा।

इसलिए आज एक अजीब-सी घोषणा मन में चल रही है। न नाराज़गी में, न हार में, बल्कि एक कड़वे एहसास के साथ। लोग मुझे पत्रकार न मानें तो बेहतर है। क्योंकि पत्रकार वह होता है, जिसकी बात सुनी जाए और यहाँ मेरी बात सिर्फ फाइलों में घूमती है।

मुझे जो भी मानना है, मान लें। जिद्दी, बेवकूफ या गिरा हुआ। क्योंकि शायद इस सिस्टम में वही लोग सफल हैं जो 25 को 37 मानकर चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं। मैं अब भी खड़ा हूँ। न पूरी तरह टूटा, न पूरी तरह जीता। बस एक अजीब-सी स्थिति में, जहाँ लड़ाई जारी है, लेकिन पहचान धुंधली हो गई है।

और शायद यही इस पूरे व्यंग्य का सबसे सटीक सार है कि यह लड़ाई जमीन की कम, और आदमी के भीतर बचे सच की आखिरी जिद की ज्यादा है। अब मैं पत्रकार के रुप में जीना नहीं चाहता, घुट-घुटकर जीना नहीं चाहता, ताने नहीं नहीं सुनना चाहता। इसीलिए मर गया हूं मैं।

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