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रांची में जमाबंदी का जादू, अबुआ कौन और बबुआ कौन? यहाँ आदेश भी ऑप्शनल है!

Kanke Land Record Row Raises Serious Questions
Illegal Jamabandi Continues Despite DCLR Order: Kanke Land Record Row Raises Serious Questions

“यही है हेमंत राज? जिसमें अबुआ कौन? और बबुआ कौन? पता करना सरसों की ढेर में सूई ढूंढने समान है…!

रांची दर्पण डेस्क/मुकेश भारतीय। राजधानी रांची के कांके अंचल में इन दिनों एक नई प्रशासनिक विद्या का उदय हुआ है, जिसका नाम है जमाबंदी प्रबंधन शास्त्र। इस शास्त्र का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है 25 कभी भी 37 हो सकता है, बशर्ते इच्छाशक्ति मजबूत हो और सिस्टम सहयोगी।

पुराने जमाने में लोग गणित पढ़ते थे, आजकल लोग डिजिटल एंट्री पढ़ते हैं। यहाँ जोड़-घटाव से ज्यादा महत्व किसने एंट्री की को दिया जाता है। जमीन का रकबा अब खेत में नहीं, फाइल और पोर्टल में उगता-बढ़ता है।

कहानी में एक किरदार और है DCLR का आदेश। यह आदेश बड़े आत्मविश्वास के साथ आया था कि मैं आया हूँ, इसलिए अब सब कुछ ठीक होगा। लेकिन कांके की धरती पर कदम रखते ही उसे अहसास हो गया कि यहाँ आदेशों का भी एक वर्गीकरण होता है।

कुछ आदेश अनिवार्य होते हैं और कुछ सुझावात्मक। दुर्भाग्यवश यह आदेश दूसरी श्रेणी में चला गया। उसने कहा कि जमाबंदी निरस्त करो तो सिस्टम ने मुस्कुराकर जवाब दिया कि पहले रसीद काट लेते हैं, फिर देखते हैं।

और फिर वह ऐतिहासिक दिन आया 16 अप्रैल 2026, जब प्रशासनिक रचनात्मकता ने अपने चरम को छू लिया। जिस जमाबंदी को कागज पर निरस्त किया जा चुका था, उसी के आधार पर बाकायदा नई राजस्व रसीद काट दी गई।

यह किसी साधारण त्रुटि का मामला नहीं था, यह उस सोच का उत्सव था, जहाँ वास्तविकता और रिकॉर्ड दो अलग-अलग ब्रह्मांडों में रहते हैं। एक में आदेश है, दूसरे में रसीद और दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र।

इधर नोटिसों का सिलसिला भी कम दिलचस्प नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पूरे तंत्र में सबसे सक्रिय तत्व नोटिस ही है। नोटिस भेजे जा रहे हैं, जवाब मांगे जा रहे हैं, तिथियाँ तय हो रही हैं। मानो पूरा सिस्टम यही साबित करने में लगा हो कि प्रक्रिया चल रही है, चाहे आधार कितना ही डगमग क्यों न हो।

सवाल यह नहीं कि गलत क्या है, सवाल यह है कि कितनी बार नोटिस भेजा गया। और यदि आप यह पूछ बैठें कि पहले गलत चीज हटाइए  तो आपको समझाया जाएगा कि पहले प्रक्रिया पूरी कीजिए।

इस पूरे नाटक का सबसे रोचक संवाद तब सामने आता है जब कहा जाता है कि आप प्रार्थी नहीं हैं। यह वाक्य अपने आप में एक दर्शन है। जिसका वैधानिक संबंध है, जो दस्तावेज लेकर खड़ा है, जो आदेश की प्रति दिखा रहा है वह प्रार्थी नहीं। और जो रिकॉर्ड को अपनी सुविधा अनुसार मोड़ दे वह प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा। यहाँ पात्रों की परिभाषा भी परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है।

इस बीच सच नाम का एक जिद्दी किरदार भी है, जो बार-बार दस्तावेजों के साथ हाजिर हो जाता है। वह आदेश दिखाता है, रसीद दिखाता है, विसंगति समझाता है, लेकिन सिस्टम उसे देखकर शांत स्वर में कहता है कि आप पहले नोटिस का जवाब दीजिए। सच को भी अब समझ आने लगा है कि यहाँ उसे सुना नहीं, प्रक्रियागत रूप से घुमाया जाएगा।

अंततः इस पूरे प्रकरण ने एक नई प्रशासनिक परिभाषा गढ़ दी है कि जमाबंदी निरस्त का अर्थ अब यह नहीं कि वह समाप्त हो गई, बल्कि यह है कि वह कागज पर समाप्त, सिस्टम में जीवित और रसीद में सक्रिय है।

और आम जनता के लिए यह एक आश्वासन भी है कि अगर आपकी जमीन आज 25 डिसमिल है तो घबराइए मत। सिस्टम चाहे तो उसे 37 बना सकता है और आपको पता भी नहीं चलेगा कि यह विकास कब और कैसे हो गया। यहाँ विकास योजनाओं से नहीं, एंट्री से होता है। यही है हेमंत राज, जिसमें अबुआ कौन? और बबुआ कौन? पता करना सरसों की ढेर में सूई ढूंढने समान है!

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