रांची दर्पण डेस्क। झारखंड हाईकोर्ट (High Court) में एक मामूली सड़क दुर्घटना से जुड़ा मामला उस समय गंभीर कानूनी मोड़ पर पहुंच गया, जब अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद जब्त की गई कार को रिलीज नहीं किया गया।
जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की एकल पीठ ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ चेतावनी दी कि आदेश की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यहां तक कि थाना प्रभारी को कस्टडी में लेकर जेल भेजा जा सकता है। अदालत की सख्ती के बाद आखिरकार शाम 6:40 बजे प्रार्थी के अधिवक्ता को कार की चाबी सौंप दी गई।
क्या है पूरा मामला? प्रार्थी की कार एक मामूली सड़क दुर्घटना के बाद जब्त कर ली गई थी। निचली अदालत (सिविल कोर्ट) ने वाहन को रिलीज करने का आदेश दिया था। इस आदेश पर कहीं से कोई रोक नहीं थी। इसके बावजूद वाहन को छोड़ा नहीं गया।
इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने भी 26 फरवरी को कार रिलीज करने का स्पष्ट निर्देश दिया था, परंतु उसका अनुपालन नहीं हुआ। इसे अदालत ने प्रथम दृष्टया न्यायिक आदेश की अवमानना की स्थिति माना।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ? दोपहर 2:15 बजे हुई सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से पहले 10 दिनों का समय मांगा गया, जिसे अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद तीन दिन का समय देने का आग्रह किया गया।
सरकारी पक्ष को सुनने के बाद अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि शुक्रवार शाम 4:30 बजे तक हर हाल में कार रिलीज कर दी जाए। साथ ही मौखिक रूप से यह भी कहा गया कि यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो अदालत अवकाश के दिन भी विशेष रूप से बैठ सकती है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सिविल कोर्ट का आदेश प्रभावी है और हाईकोर्ट ने भी रिलीज का निर्देश दिया है, तब वाहन को रोके रखना न्यायिक आदेश की अवमानना है।
एसपी और थाना प्रभारी हुए तलबः हाईकोर्ट के निर्देश पर रांची के एसपी और डोरंडा थाना की प्रभारी दीपिका प्रसाद को सशरीर उपस्थित होना पड़ा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो थाना प्रभारी को कस्टडी में लेकर जेल भेजने पर भी विचार किया जाएगा।
इस कड़ी चेतावनी के बाद पुलिस महकमे में हलचल मच गई और अंततः शाम 6:40 बजे वाहन को रिलीज कर दिया गया।
प्रार्थी पक्ष की दलीलः प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन ने अदालत को बताया कि वे पूर्व में मिले आदेश की प्रति और आवश्यक दस्तावेज लेकर थाना गए थे, लेकिन वहां आदेश का पालन नहीं किया गया। एक दिन पहले भी आदेश का अनुपालन नहीं हुआ था, जिससे उन्हें दोबारा अदालत की शरण लेनी पड़ी।
आदेश की अवमानना कितनी गंभीर? भारतीय विधि व्यवस्था में न्यायालय के आदेश की अवहेलना को अत्यंत गंभीर माना जाता है।
अवमानना का सिद्धांत (Contempt of Court): यदि कोई सरकारी अधिकारी जानबूझकर न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करता तो यह सिविल कंटेम्प्ट की श्रेणी में आ सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई संभव है।
जब्ती और सुपुर्दगी का सिद्धांत: आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जब्त संपत्ति को अदालत उचित शर्तों के साथ अंतरिम सुपुर्दगी (Interim Custody) में दे सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई फैसलों में कहा है कि वाहनों को लंबे समय तक थानों में खड़ा रखना उचित नहीं है, क्योंकि इससे उनकी स्थिति खराब होती है।
प्रशासनिक जवाबदेही: यदि किसी अधिकारी ने न्यायिक आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं की तो यह न केवल अवमानना बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का भी मामला बन सकता है।
बड़ा संदेश क्या है? यह मामला केवल एक कार रिलीज का नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों की सर्वोच्चता का है। हाईकोर्ट की सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत के आदेश को हल्के में लेना किसी भी अधिकारी के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
न्यायपालिका ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि कानून के शासन (Rule of Law) में किसी भी स्तर पर मनमानी की गुंजाइश नहीं है। स्रोतः रांची दर्पण डेस्क / मुकेश भारतीय
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