
रांची दर्पण डेस्क। सिविल कोर्ट रांची स्थित कुटुंब न्यायालय ने न्यायिक आदेशों की अवहेलना को गंभीरता से लेते हुए एक सख्त कदम उठाया है। भरण-पोषण से जुड़े एक पुराने मामले में अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर सुखदेवनगर थाना प्रभारी का मासिक वेतन रोकने का आदेश पारित किया गया है। यह आदेश कुटुंब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पवन कुमार की अदालत ने सुनवाई के दौरान जारी किया।
मामला वर्ष 2007 से जुड़ा है, जब सुषमा देवी ने अपने पति विनोद कुमार सिंह के खिलाफ भरण-पोषण की मांग को लेकर कुटुंब न्यायालय में मुकदमा दर्ज कराया था। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने विनोद कुमार सिंह को निर्देश दिया था कि वह प्रत्येक माह निर्धारित राशि सुषमा देवी को भरण-पोषण के रूप में भुगतान करें। लेकिन आदेश के बावजूद पति द्वारा लगातार भुगतान नहीं किया गया।
अदालत की सख्ती यहीं नहीं रुकी। पति द्वारा आदेश की अवहेलना जारी रहने पर कुटुंब न्यायालय ने अक्टूबर 2024 में विनोद कुमार सिंह के खिलाफ डिस्ट्रेस वारंट जारी किया। इस वारंट के माध्यम से बकाया भरण–पोषण राशि की वसूली सुनिश्चित की जानी थी। डिस्ट्रेस वारंट के निष्पादन की जिम्मेदारी सुखदेवनगर थाना प्रभारी को सौंपी गई थी।
हालांकि, अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, थाना प्रभारी द्वारा अब तक न तो डिस्ट्रेस वारंट का पालन किया गया और न ही इसकी तमिला रिपोर्ट अदालत को सौंपी गई। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अदालत की ओर से कई बार पत्राचार करने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। यहां तक कि न्यायालय ने शोकॉज नोटिस जारी कर थाना प्रभारी से स्पष्टीकरण भी मांगा, लेकिन आदेशों को लगातार नजरअंदाज किया गया।
इन परिस्थितियों को देखते हुए प्रधान न्यायाधीश पवन कुमार ने कड़ा रुख अपनाते हुए सुखदेवनगर थाना प्रभारी का मासिक वेतन रोकने का आदेश पारित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है और प्रशासनिक अधिकारियों को भी अदालत के आदेशों का पालन अनिवार्य रूप से करना होगा।
आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कुटुंब न्यायालय ने इस पूरे मामले की जानकारी सीनियर एसपी रांची को पत्र के माध्यम से भेज दी है। ताकि थाना प्रभारी के वेतन रोकने के आदेश का पालन सुनिश्चित किया जा सके और डिस्ट्रेस वारंट के निष्पादन में तेजी लाई जा सके।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह आदेश न केवल संबंधित अधिकारी के लिए चेतावनी है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि न्यायालय अपने आदेशों की गरिमा बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। साथ ही, यह फैसला उन पीड़ितों के लिए उम्मीद की किरण है, जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।










