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ये हैं रांची के चमत्कारी सीओ, जानते हैं जमाबंदी का अजूबा गणित

-: मुकेश भारतीय :-

राजधानी रांची में इन दिनों एक ऐसा गणित चर्चा में है, जिसे अगर स्कूलों में पढ़ा दिया जाए तो गणितज्ञ शिक्षक भी नौकरी छोड़ दें। यहाँ 25 डिसमिल की जमीन से 37 डिसमिल की रसीद कट रही है और यह सब किसी जादूगर ने नहीं, बल्कि राजस्व विभाग के एक जिम्मेदार अंचल अधिकारी (सीओ) के कार्यकाल में संभव हुआ है।

अब सवाल उठता है कि यह चमत्कार है, लापरवाही है या फिर कोई बेहद रचनात्मक प्रशासनिक प्रयोग, या खुला भ्रष्टाचार? जनता भी असमंजस में है। कुछ इसे अज्ञानता का नमूना मान रहे हैं तो कुछ इसे सोची-समझी चालाकी का परिणाम बता रहे हैं।

यह वही सीओ हैं, जिनका नाम पहले भी एक चर्चित जमीन प्रकरण में सामने आ चुका है, जहाँ प्रवर्तन निदेशालय (ED) पूछताछ कर चुका है और उस मामले में एक आईएएस अधिकारी जेल तक जा चुके हैं। लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था का कमाल देखिए कि ऐसी पृष्ठभूमि के बावजूद उन्हें न तो हाशिए पर भेजा गया, न ही जिम्मेदारी कम की गई, बल्कि राजधानी के ही एक और मलाईदार अंचल में बैठा दिया गया। इसे संयोग कहें या सिस्टम की उदारता? यह अपने आप में एक अलग कहानी है।

मामला एक 25 डिसमिल जनरल प्लॉट की है। वर्ष 2010 में पूरे प्लॉट की विधिवत रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज और जमाबंदी के साथ दर्ज हुई थी। अबतक उनके नाम से रसीद कटती रही है, जमीन पर बाउंड्री के साथ दखल-कब्जा भी बना है।

सब कुछ व्यवस्थित चल रहा था, जब तक कि वर्ष 2022 में अचानक उसी प्लॉट में 12 डिसमिल अतिरिक्त जमीन उग नहीं आई। न जमीन बढ़ी, न सीमाएं बदलीं, लेकिन कागजों में रकबा 25 से 37 डिसमिल हो गया और उसी के अनुसार रसीद भी कटने लगी। यह बदलाव किसी प्राकृतिक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि कागजी प्रक्रिया से हुआ, जो अपने आप में एक अदृश्य विकास मॉडल जैसा प्रतीत होता है।

जब इस विसंगति की जानकारी वर्ष 2012 के क्रेता को हुई तो उन्होंने सीओ से लेकर डीसी तक शिकायत की। जन शिकायत कोषांग में मामला डाला गया, आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी गई, प्रथम अपील तक की प्रक्रिया अपनाई गई और कई नोटिस भी जारी हुए। अपर समाहर्ता ने भी कार्रवाई रिपोर्ट तलब की, लेकिन हर स्तर पर फाइलें चलती रहीं और परिणाम शून्य ही रहा। ऐसा लगा मानो सिस्टम समस्या के समाधान से अधिक उसे लंबित रखने में दक्ष हो चुका है।

आखिरकार मामला डीसीएलआर कोर्ट पहुंचा, जहाँ लंबी सुनवाई के बाद आदेश दिया गया कि 12 डिसमिल की फर्जी जमाबंदी रद्द की जाए और संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। लेकिन यह आदेश भी शायद दफ्तर की दीवारों से टकराकर रह गया, क्योंकि पांच महीने बीत जाने के बाद भी न तो जमाबंदी निरस्त हुई है और न ही कोई रिपोर्ट सामने आई है। आदेश की मौजूदगी और उसके अनुपालन के बीच की दूरी ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

जब मामला एंटी क्रप्शन ब्यूरो (एसीबी) तक पहुंचा तो सीओ ने इसे अपने संज्ञान से बाहर और बड़ी गलती बताते हुए सुधार का आश्वासन दिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी रोचक है। दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर उनसे कागजात मांगे जाने लगे। अब सवाल यह है कि जिस कार्यालय के पास पूरे मामले का रिकॉर्ड मौजूद है, वही कार्यालय जनता से प्रमाण मांग रहा है। यह प्रक्रिया समाधान की दिशा में कदम है या केवल समय बिताने और किसी गैंग को बचाने का एक औपचारिक माध्यम यह स्पष्ट नहीं हो पाता।

आज स्थिति यह है कि यह मामला प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन चुका है। उसे न इसे पूरी तरह सुलझाया जा रहा है, न ही इसे खत्म किया जा रहा है। यदि गहराई से जांच होती है तो कई स्तरों पर जवाबदेही तय हो सकती है और यदि नहीं होती तो ऐसे मामलों से व्यवस्था की विश्वसनीयता लगातार प्रभावित होती रहेगी। अंततः आम नागरिक के मन में यही प्रश्न उठता है कि आखिर यह कैसा तंत्र है, जहाँ जमीन कागजों में बढ़ जाती है, लेकिन जिम्मेदारी उतनी ही तेजी से घट जाती है।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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