कांके अंचल कार्यालय के नेवरी मौजा में नक्शा से ‘गायब’ हुआ आदिवासी प्लॉट!

रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची के कांके अंचल कार्यालय से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने राजस्व अभिलेखों की पारदर्शिता और आदिवासी भूमि संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नेवरी मौजा में जमीन दलालों और अभिलेखीय हेरफेर के जरिए एक आदिवासी प्लॉट को ही “गायब” कर दिया गया है। प्रथम दृष्टया उपलब्ध दस्तावेजों और नक्शाई प्रविष्टियों में कई विसंगतियाँ सामने आई हैं, जिनकी फॉरेंसिक और विधिक जांच की मांग उठने लगी है।
प्लॉट नंबरों में उलटफेर, चौहद्दी में बदलावः मामला नेवरी मौजा के प्लॉट संख्या- 1333 आदिवासी (सनिका मुण्डा) भूमि, प्लॉट संख्या- 1334 नक्शे में पश्चिम दिशा में निकला हुआ, प्लॉट संख्या- 1335 संबंधित सामान्य प्लॉट, प्लॉट संख्या- 1336 सामान्य प्लॉट जुड़ा है।
विक्रय विलेख (डीड) में प्लॉट संख्या 1335 की पश्चिमी रेखा के सामने 1336 अंकित किया गया है। जबकि नक्शाई चौहद्दी में प्लॉट संख्या 1333 को हटाकर 1334 दर्शाया गया। इतना ही नहीं 1333 को 1336 के रूप में प्रदर्शित करते हुए जनरल प्लॉट 1336 की आड़ में आदिवासी प्लॉट 1333 का हस्तांतरण दर्शाने का प्रयास किया गया।
राजस्व विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह तथ्य प्रमाणित होता है तो यह न केवल अभिलेखीय कूटकरण का मामला बनता है, बल्कि झारखंड में लागू आदिवासी भूमि संरक्षण संबंधी विधिक प्रावधानों की संभावित अवहेलना भी हो सकती है।
संदिग्ध विक्रय विलेख और पारिवारिक गवाहः उक्त विक्रय विलेख में क्रेता- राज शेखर, विक्रेता- राजू लोहार, गवाह- विक्रेता राजू लोहार के दोनों पुत्र मंटू लोहार और मुकेश लोहार के नाम का उल्लेख करते हुए उसके हस्ताक्षर दर्शाए गए हैं। प्रथम दृष्टया यह प्रश्न उठता है कि पारिवारिक गवाहों के माध्यम से किया गया यह विक्रय कितना निष्पक्ष और विधिसम्मत है।
हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता, दस्तावेजों में अंकन की सटीकता तथा तथ्यात्मक स्थिति की फॉरेंसिक जांच की मांग इसलिए भी उठ रही है, क्योंकि प्लॉट संख्या और चौहद्दी में स्पष्ट विरोधाभास दिख रहा है। विक्रेता और गवाहों के समान हस्ताक्षर भी इस फर्जीवाड़ा की कहानी को साफ करती है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि किसी आदिवासी भू-खंड को सामान्य श्रेणी के प्लॉट की आड़ में स्थानांतरित दर्शाया गया है तो यह सुनियोजित षड्यंत्र की श्रेणी में आ सकता है।
पृथक जमाबंदी सृजन और क्षेत्रफल में विसंगतिः सबसे गंभीर पहलु यह है कि उपरोक्त संदिग्ध विक्रय के आधार पर अंचल कार्यालय द्वारा पृथक जमाबंदी सृजित कर दी गई। प्लॉट संख्या 1336 के साथ-साथ सामान्य प्लॉट 1335 में भी वही क्रेता-विक्रेता दर्शाते हुए जमाबंदी स्वीकृत कर ली गई। जमाबंदी कायम करने वाले तात्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी शीलवंत कुमार बैठा थे, जो अपने कार्यकल में तीन बार अंचलाधिकारी पद का प्रभार लिया था।
पहले से ही 25 डिसमिल के स्थान पर 37 डिसमिल दर्शाए जाने का मामला सुर्खियों में रहा है। यह संकेत देता है कि बिना समुचित सत्यापन के अभिलेख स्वीकृत किए गए, राजस्व रिकॉर्ड में संभावित रूप से जानबूझकर परिवर्तन किया गया, प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
यदि क्षेत्रफल में 12 डिसमिल की वृद्धि दर्शाई गई है तो यह केवल लेखन त्रुटि नहीं बल्कि गंभीर अभिलेखीय हेरफेर का मामला बन सकता है।
संभावित आपराधिक आयामः विशेषज्ञों के अनुसार प्रथम दृष्टया यह मामला राजस्व अभिलेखों में कूटकरण/छेड़छाड़, धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र, पद का दुरुपयोग, फर्जी दस्तावेज एवं गवाही, आदिवासी भूमि संरक्षण कानूनों का उल्लंघन आदि की पोल खोल रही है।
यदि सरकारी पदाधिकारी की संलिप्तता सिद्ध होती है तो भ्रष्टाचार निवारण संबंधी विधिक प्रावधान भी लागू हो सकते हैं। लेकिन सवाल यही है कि इसे देखने वाला कोई नहीं है।
सवालों के घेरे में अंचल प्रशासनः हैरानी की बात यह है कि कथित गड़बड़ियों की जानकारी होने के बावजूद कांके अंचल कार्यालय से लेकर जिला कार्यालय तक द्वारा कोई कार्रवाई की सूचना सामने नहीं आई है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि मामला दबाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, संबंधित अधिकारियों से इस बाबत आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हो सकी है।
भूमि मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते अभिलेखों की स्वतंत्र जांच, मूल नक्शों का मिलान, डिजिटल रिकॉर्ड का ऑडिट और हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच नहीं कराई गई तो यह मामला आगे चलकर बड़े भूमि घोटाले का रूप ले सकता है।
समाचार स्रोत: मुकेश भारतीय / मीडिया स्थल निरीक्षण रिपोर्ट





