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रांची का चोकाहातू और मुंडा सभ्यता के तीन हजार साल पुराने मेगालिथ का रहस्य

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 65 किलोमीटर दूर सोनाहातू प्रखंड के अंतर्गत स्थित चोकाहातू नामक स्थान आज शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और मानवशास्त्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।Chokahatu of Sonahatu and the three thousand year old megaliths of the Munda civilization 1

यहां मौजूद हजारों की संख्या में प्राचीन पत्थर को मेगालिथ या स्थानीय भाषा में ‘ससनदिरी’ कहा जाता है। मुंडा समुदाय की सभ्यता, परंपरा और इतिहास की गवाही देते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो यह स्थल तीन हजार साल से भी अधिक पुराना हो सकता है और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

1870 में हुई थी खोज, आज भी अनसुलझे हैं रहस्यः चोकाहातू के मेगालिथों की खोज सबसे पहले ब्रिटिश काल में अंग्रेज कर्नल एडवर्ड डाल्टन ने लगभग 1870 के आसपास की थी। डाल्टन, जो उस समय छोटानागपुर क्षेत्र के आदिवासी समाज पर अध्ययन कर रहे थे, उन्होंने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि चोकाहातू क्षेत्र में तीन हजार से अधिक विशाल पत्थर मौजूद हैं, जो किसी विशेष उद्देश्य और विधि के तहत स्थापित किए गए हैं। यह खोज उस समय तो सीमित दायरे में ही रह गई, लेकिन आज यह स्थल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनता जा रहा है।

मुंडा समुदाय का सबसे प्राचीन कब्रिस्तानः लंदन के प्रसिद्ध शोधकर्ता और लेखक एंथोनी कैटेचूरियन का मानना है कि चोकाहातू में मौजूद मेगालिथ मुंडा समुदाय के सबसे पुराने कब्रिस्तान का हिस्सा हैं। उनके अनुसार, “इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर कोई इस स्थल को गहराई से समझ ले, तो मुंडा समुदाय की उत्पत्ति, उनकी सामाजिक संरचना और धार्मिक विश्वासों के बारे में कई अहम जानकारियां सामने आ सकती हैं।”

कैटेचूरियन बताते हैं कि यह केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता की कहानी है, जिसे अभी ठीक से पढ़ा और समझा जाना बाकी है।

‘क्राउन ज्वेल’ का दर्जा, फिर भी उपेक्षाः झारखंड सरकार ने चोकाहातू को राज्य की सांस्कृतिक धरोहरों में ‘क्राउन ज्वेल’ का दर्जा दिया है। सरकार के दस्तावेजों में इसे क्षेत्र की अब तक ज्ञात सबसे बड़ी और प्राचीन मेगालिथ साइट माना गया है। इसके बावजूद, संरक्षण, प्रचार-प्रसार और वैज्ञानिक अध्ययन के स्तर पर अब तक अपेक्षित प्रयास नहीं हो सके हैं।

स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर इस स्थल को सही तरीके से विकसित किया जाए, तो यह झारखंड के लिए सांस्कृतिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बन सकता है।

ससनदिरी : मुंडा समाज की अनोखी परंपराः चोकाहातू के मेगालिथ केवल पत्थर नहीं हैं, बल्कि मुंडा समुदाय की एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा ससनदिरी से जुड़े हुए हैं। ससनदिरी प्रथा के तहत मृतक की हड्डियों को विधि-विधान के साथ मिट्टी के एक बर्तन में रखा जाता था, जिसे जमीन में गाड़ दिया जाता और उसके ऊपर एक विशाल पत्थर रखा जाता था। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि मुंडा समाज अपने पूर्वजों को कितना सम्मान देता था।

कई क्षेत्रों में ये पत्थर जमीन में गाड़े जाते हैं, जबकि चोकाहातू में अधिकांश पत्थर जमीन पर लिटाए हुए पाए जाते हैं। कुछ पत्थर एक-दूसरे के ऊपर एक विशेष पैटर्न में रखे गए हैं, जो उस समय की वास्तुकला और सांकेतिक भाषा को दर्शाते हैं।

स्थानीय लोगों की आंखों देखीः सोनाहातू के स्थानीय निवासी और ग्रामीण चिकित्सक डॉ. प्रदीप बताते हैं कि चोकाहातू क्षेत्र में हजारों की संख्या में ससनदिरी मौजूद हैं। “ये पत्थर आम तौर पर जमीन में गाड़े हुए नहीं हैं, बल्कि लिटाए हुए हैं। कुछ बड़े पत्थर इस तरह रखे गए हैं, मानो किसी विशेष अनुष्ठान के तहत उन्हें सजाया गया हो,” वे आगे कहते हैं कि बीते कुछ दशकों में कई पत्थर नष्ट भी हुए हैं, जिससे इस धरोहर को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

3000 साल से भी अधिक पुरानी सभ्यताः एंथोनी कैटेचूरियन के अनुसार, रांची में उपलब्ध कार्बन डेटिंग सुविधाओं से यह अनुमान लगाया गया है कि चोकाहातू के मेगालिथ कम से कम तीन हजार साल पुराने हैं। हालांकि उनका मानना है कि यदि आधुनिक और उन्नत कार्बन डेटिंग तकनीकों का उपयोग किया जाए, तो इनकी आयु इससे भी अधिक पुरानी सिद्ध हो सकती है।

उन्होंने यह भी बताया कि कई मेगालिथों पर ऐसे अभिलेख और चिह्न पाए गए हैं, जिन्हें अब तक पढ़ा नहीं जा सका है। ये चिह्न या तो पत्थरों पर तराशे गए हैं या उकेरे गए हैं, जो किसी प्रकार की प्राचीन लिपि या प्रतीकात्मक भाषा की ओर इशारा करते हैं।

कौन थे ये लोग, जिनके लिए खड़े किए गए विशाल पत्थर? विशेषज्ञों का मानना है कि किसी कब्र के लिए इतने विशाल मेगालिथ स्थापित करना और उस पर कुछ अंकित करना इस बात का संकेत है कि वह व्यक्ति समाज में किसी विशेष महत्व का रहा होगा—शायद कोई प्रमुख नेता, योद्धा या धार्मिक गुरु।

डीएसपीएमयू (डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय) के सहायक प्राध्यापक और शोधकर्ता अभय सागर मिंज का कहना है, “यह हड़गड़ी यानी कब्रिस्तान वाली जगह है। ऐसे में पत्थरों के नीचे हड्डियां मिलने की पूरी संभावना है। सरकार को चाहिए कि इन हड्डियों की वैज्ञानिक तरीके से खुदाई कर कार्बन डेटिंग कराए, ताकि इस स्थल के काल का सही निर्धारण हो सके।”

भूगर्भीय जांच भी जरूरीः अभय सागर मिंज यह भी सवाल उठाते हैं कि इतने बड़े-बड़े पत्थर उस प्राचीन काल में आखिर लाए कैसे गए होंगे। “इन पत्थरों की भूगर्भीय जांच जरूरी है। इससे यह पता चल सकता है कि ये पत्थर स्थानीय हैं या किसी दूरस्थ क्षेत्र से लाए गए हैं। अगर ये दूर से लाए गए हैं, तो यह उस समय की तकनीकी क्षमता और सामाजिक संगठन पर नई रोशनी डालेगा,” वे कहते हैं।

यूनेस्को विश्व धरोहर की मांगः शोधकर्ता शुभाशीष दास सहित कई इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से यह मांग उठा रहे हैं कि चोकाहातू को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाए। उनका कहना है कि यह स्थल न केवल झारखंड या भारत, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है।

हालांकि सवाल यह है कि इसकी पहल कौन करेगा? विशेषज्ञों के अनुसार जब तक राज्य सरकार केंद्र सरकार के माध्यम से यूनेस्को के समक्ष औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखती, तब तक यह सपना साकार नहीं हो सकता।

संरक्षण के बिना खतरे में धरोहरः आज चोकाहातू की सबसे बड़ी समस्या संरक्षण की कमी है। बढ़ती आबादी, अतिक्रमण, पत्थरों का निर्माण कार्यों में उपयोग और प्राकृतिक क्षरण इस ऐतिहासिक स्थल को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां शायद इस अनमोल धरोहर को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।Chokahatu of Sonahatu and the three thousand year old megaliths of the Munda civilization 2

इतिहास से संवाद का अवसरः चोकाहातू केवल अतीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद का एक सेतु है। यह स्थल हमें बताता है कि आदिवासी समाज, जिसे अक्सर हाशिए पर रखा गया, उसकी अपनी समृद्ध संस्कृति, वैज्ञानिक समझ और सामाजिक संरचना थी।

अगर चोकाहातू को संरक्षित कर सही ढंग से विकसित किया जाए, तो यह न सिर्फ झारखंड की पहचान को वैश्विक स्तर पर मजबूती देगा, बल्कि मुंडा समुदाय के गौरवशाली इतिहास को भी वह सम्मान दिलाएगा, जिसका वह हकदार है।

आज जरूरत है ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी की। ताकि चोकाहातू की यह अनमोल धरोहर समय की धूल में गुम होने से बच सके और विश्व पटल पर अपनी जगह बना सके।

Ranchi Darpan

वरीय पत्रकार मुकेश भारतीय (Mukesh Bhartiy) पिछले 35 वर्षों से समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रूप में सक्रिय हैं। उन्हें समसामयिक राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक मुद्दों और क्षेत्रीय समाचारों पर गहरी समझ और विश्लेषणात्मक अनुभव है। उनका उद्देश्य ताज़ा खबरें, विश्वसनीय रिपोर्टिंग और प्रासंगिक दृष्टिकोण को पाठकों तक ईमानदारी से पहुँचाना है। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ (Expert Media News) सर्विस द्वारा प्रकाशित-प्रसारित राँची दर्पण (Ranchi Darpan) के माध्यम से वे राजधानी राँची और उसके आसपास से जुड़ी स्थानीय खबरें, प्रशासनिक मुद्दे एवं राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। वे मानते हैं कि स्थानीय पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी, प्रमाण और जनहित के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके।

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