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सूचना आयोग को लेकर हाईकोर्ट सख्त, मुख्य सचिव व कार्मिक सचिव तलब

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में सूचना का अधिकार (आरटीआई) व्यवस्था की बदहाली पर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। राज्य सूचना आयोग के लंबे समय से गैर-कार्यशील रहने को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने न सिर्फ सरकार से जवाब मांगा, बल्कि मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश भी दिया है।

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सूचना का अधिकार केवल एक वैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जिसकी अनदेखी किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय के समक्ष यह मामला एक अपील याचिका के रूप में आया। सुनवाई के दौरान कार्मिक सचिव कोर्ट में उपस्थित थे।

सरकार का पक्ष सुनने के बाद खंडपीठ ने अगली सुनवाई के लिए 29 जनवरी की तिथि निर्धारित करते हुए मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव दोनों को तलब किया।

कोर्ट ने संकेत दिए कि यदि इसके बावजूद राज्य सूचना आयोग को कार्यशील नहीं बनाया गया, तो राज्य सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

इससे पूर्व, 7 जनवरी को हुई सुनवाई में भी हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी की थी। तब खंडपीठ ने कार्मिक विभाग के प्रधान सचिव को चयन प्रक्रिया से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया था।

अदालत ने साफ कहा था कि सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न होना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी आदेशों की भी अवहेलना है।

मामले की पृष्ठभूमि में प्रार्थी बीरेंद्र सिंह द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी शामिल है। निर्धारित 30 दिनों की अवधि में सूचना नहीं मिलने पर उन्होंने प्रथम अपील दायर की, लेकिन इसके बावजूद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

इसके बाद दूसरी अपील राज्य सूचना आयोग में दायर की जानी थी, परंतु आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न होने के कारण आयोग लंबे समय से निष्क्रिय है। इसी कारण प्रार्थी को न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि जब वैधानिक अपीलीय संस्था ही निष्क्रिय हो तो नागरिक के पास संवैधानिक उपाय के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

हालांकि, एकल पीठ ने पहले याचिका खारिज करते हुए आरटीआई अधिनियम के तहत वैकल्पिक उपाय अपनाने की छूट दी थी, जिसके खिलाफ यह अपील दायर की गई।

खंडपीठ ने अपने मौखिक अवलोकन में कहा कि सूचना आयोग का निष्क्रिय रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक है। आरटीआई कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन जब उसकी रीढ़ मानी जाने वाली संस्था ही ठप हो तो आम नागरिक का अधिकार व्यर्थ हो जाता है।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वह समय पर नियुक्तियां कर आयोग को कार्यशील बनाए।

हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद राज्य सरकार पर दबाव बढ़ गया है। अब 29 जनवरी की सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि सरकार केवल आश्वासन देती है या वास्तव में सूचना आयोग को सक्रिय बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाती है।

Ranchi Darpan

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।

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