बीआईटी मेसरा में सुरक्षा गार्ड की मौत को लेकर दूसरे दिन भी कॉलेज गेट जाम जारी

बीआईटी मेसरा की यह घटना झारखंड के शिक्षा संस्थानों में काम करने वाले असंगठित मजदूरों की दयनीय स्थिति पर सवाल खड़े कर रही है। बीआईटी मेसरा जैसे नामी कॉलेज में सैकड़ों सुरक्षा गार्ड और अन्य स्टाफ कार्यरत हैं, लेकिन क्या उनके लिए कोई स्वास्थ्य बीमा या सुरक्षा प्रोटोकॉल है?

मेसरा (रांची दर्पण ब्यूरो)। झारखंड के मशहूर बीआईटी मेसरा (इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर) में एक सुरक्षा गार्ड की ड्यूटी के दौरान हुई आकस्मिक मौत ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया है। नया टोली के निवासी जगु महतो का पार्थिव शरीर घर पहुंचते ही आक्रोश की चिंगारी भड़क उठी  है और अब दूसरे दिन भी परिवार, ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आंदोलन जोर पकड़ रहा है। सुबह 10 बजे से कॉलेज गेट को जाम कर दिए गए हैं, लेकिन प्रबंधन की ओर से फिलहाल कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आ रही है। यह घटना न केवल एक परिवार की त्रासदी है, बल्कि झारखंड के मूल निवासियों और विस्थापित मजदूरों की लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा को भी उजागर कर रही है।

जगु महतो (45 वर्ष),बीआईटी मेसरा में पिछले कई वर्षों से सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत थे। वे नया टोली के एक साधारण विस्थापित परिवार से ताल्लुक रखते थे, जहां जीवन की जद्दोजहद रोजमर्रा की कहानी है। 4 अक्टूबर 2025 को ड्यूटी के दौरान उनकी अचानक मौत हो गई। मौत का सटीक कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है।

परिवार के सदस्यों का आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने बिना किसी पोस्टमॉर्टम या जांच के शव को सीधे अस्पताल से घर भेज दिया। प्रबंधन ने न जांच की, न मुआवजे का वादा किया। बस शव को जैसे कूड़े की तरह फेंक दिया।

घटना के दूसरे दिन यानी 5 अक्टूबर को सुबह 10 बजे से ही नया टोली के ग्रामीणों ने जगु महतो के पार्थिव शरीर को कंधों पर उठाए बीआईटी गेट पर धरना देना शुरू कर दिया। आंदोलनकारियों की संख्या तेजी से बढ़ती गई। सैकड़ों ग्रामीण, स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मैदान में उतर आए।

जेएलकेएम (झारखंड लोकतांत्रिक क्रांति मोर्चा) के केंद्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्र नाथ महतो ने मौके पर पहुंचकर आंदोलन को संबोधित किया और कहा कि यह केवल एक मौत का सवाल नहीं है, बल्कि झारखंड के मूल निवासियों की वास्तविक स्थिति का आईना है। विस्थापित मजदूरों को कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में नौकरी मिलती है, लेकिन सम्मान और सुरक्षा? वो तो सपना ही है। प्रबंधन ने 9 घंटे से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद वीसी या रजिस्ट्रार को वार्ता के लिए नहीं भेजा। हम न्याय मांग रहे हैं।

उनके साथ कमलेश राम, संजय महतो समेत अन्य स्थानीय नेता भी मौजूद थे, जो ग्रामीणों को एकजुट रखने में जुटे रहे। आंदोलन का असर कॉलेज के छात्रों पर भी पड़ रहा है। दुर्गा पूजा की छुट्टियों के बाद लौट रहे छात्रों को गेट जाम के कारण भारी परेशानी हो रही है। कई छात्रों को वापस घर लौटना पड़ा, जबकि कुछ ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर की। खबर लिखे जाने तक आंदोलन जारी है और स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं मजदूरों की अनदेखी को दर्शाती हैं। जेएलकेएम ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द न्याय न मिला, तो आंदोलन और तेज होगा। परिवार की मांग है, न केवल आर्थिक सहायता, बल्कि मौत की सच्चाई सामने लाना।

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