ओरमांझी (रांची दर्पण)। देश की आज़ादी की नींव जिन शहादतों पर टिकी है, उनमें झारखंड के वीर सपूत शहीद शेख भिखारी और शहीद टिकैत उमराव सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। हर वर्ष 8 जनवरी को पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ उनके शहादत दिवस का आयोजन होता है। उन्हें पुष्प अर्पित किए जाते हैं। लंबे-चौड़े भाषण दिए जाते हैं और देशभक्ति के नारे गूंजते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन अमर शहीदों के वंशज आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ओरमांझी प्रखंड के खटंगा, खुदिया और लोटवा जैसे गांवों की स्थिति बद से बदतर बनी हुई है। शहीदों के वंशजों के पास न पक्का मकान है, न स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, न ही चलने लायक पक्की सड़क।
कई परिवार ऐसे हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी किसी जंग से कम नहीं। सरकारी योजनाएं कागजों में जरूर हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में उनका नामोनिशान तक नहीं दिखता।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल 8 जनवरी को प्रशासन और जनप्रतिनिधि आते हैं, श्रद्धांजलि देते हैं और वंशजों को प्रतीकात्मक रूप से एक कंबल देकर लौट जाते हैं। इसके बाद पूरे साल कोई सुध लेने वाला नहीं होता। शहीदों की कुर्बानी का असली सम्मान तब होता, जब उनके परिवारों को सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं मिलतीं।
इतिहास गवाह है कि 1857 की आज़ादी की पहली लड़ाई में शहीद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी। शहीद शेख भिखारी का जन्म 1819 में ओरमांझी प्रखंड की कूटे पंचायत अंतर्गत खुदिया टोटवा गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था।
वहीं टिकैत उमराव सिंह का जन्म पश्चिमी इलाके के खटंगा गांव में हुआ। शेख भिखारी की वीरता, बुद्धिमत्ता और सैन्य कौशल से प्रभावित होकर खटंगा के राजा टिकैत उमराव सिंह ने उन्हें अपना दीवान नियुक्त किया था।
1857 के विद्रोह के दौरान दोनों वीरों ने चुटूपालु घाटी में अंग्रेजों के खिलाफ कई दिनों तक भीषण युद्ध किया। अंग्रेजी सेना उनके साहस के आगे टिक नहीं पाई।
अंततः धोखे से दोनों को गिरफ्तार किया गया और बिना किसी मुकदमे के 8 जनवरी 1858 को चुटूपालु पहाड़ के बरगद पेड़ पर फांसी दे दी गई। यह केवल दो व्यक्तियों की हत्या नहीं थी, बल्कि आज़ादी की अलख को दबाने की नाकाम कोशिश थी।
आज सैकड़ों साल बाद भी उनकी शहादत लोगों के दिलों में जीवित है, लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज और सरकार ने अपना फर्ज निभाया? क्या शहीदों के वंशजों को वह सम्मान और अधिकार मिले, जिसके वे हकदार हैं?
शहीद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह की कुर्बानी को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अब जरूरत है कि श्रद्धांजलि सिर्फ मंचों तक सीमित न रहे। बल्कि विकास, न्याय और सम्मान के रूप में उनके वंशजों तक पहुंचे। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही उनकी शहादत का असली मोल होगा।