झारखंड HC में हेबियस कॉर्पस याचिका पर अहम सुनवाई, कांके SHO पर कार्रवाई

अनिल टाइगर हत्याकांड से जुड़े मामले में हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई, कोर्ट के आदेश पर ग्रामीण एसपी हुए पेश, कांके थाना प्रभारी पर विभागीय कार्रवाई शुरू

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड हाईकोर्ट ने अनिल टाइगर हत्याकांड से जुड़े एक संवेदनशील मामले में दायर हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। यह याचिका देवव्रत नाथ शाहदेव की हिरासत को चुनौती देते हुए दायर की गई थी, जिन्हें एक मामले में अग्रिम जमानत मिलने के बावजूद पुलिस ने हिरासत में रखा था।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने इस मामले की दो अलग-अलग सत्रों में सुनवाई की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने न केवल पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए बल्कि राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब भी तलब किया, जिससे पूरा मामला न्यायिक निगरानी में आ गया।

अग्रिम जमानत के बाद भी हिरासत पर उठा सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि देवव्रत नाथ शाहदेव को अनिल टाइगर हत्याकांड से जुड़े मामले में अग्रिम जमानत मिल चुकी थी, इसके बावजूद उन्हें कथित रूप से अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया। इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन बताते हुए हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की गई थी।

अदालत ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया कि किसी व्यक्ति को न्यायालय से राहत मिलने के बाद भी पुलिस कार्रवाई जारी रही। खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा कि कानून के तहत मिली सुरक्षा को दरकिनार करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा आघात है।

पुलिस की कार्यशैली पर हाईकोर्ट की कड़ी नाराजगी

सुनवाई के पहले सत्र में अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर तीखी प्रतिक्रिया दी। खंडपीठ ने कहा कि पुलिस को कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करनी चाहिए, न कि मनमाने तरीके से। न्यायाधीशों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना ठोस आधार किसी व्यक्ति को रात में उठाकर हिरासत में लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

अदालत की टिप्पणी से यह साफ झलक रहा था कि न्यायपालिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही या मनमानी को बर्दाश्त करने के पक्ष में नहीं है।

एसएसपी को सशरीर उपस्थित होने का निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए खंडपीठ ने रांची के वरीय पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को दोपहर 2:30 बजे अदालत में सशरीर उपस्थित होने का निर्देश दिया था। यह निर्देश इस बात का संकेत था कि अदालत मामले में जिम्मेदारी तय करने के मूड में है। हालांकि दूसरे सत्र में एसएसपी की जगह ग्रामीण एसपी प्रवीण पुष्कर अदालत में उपस्थित हुए।

अदालत को बताया गया कि एसएसपी अवकाश पर हैं, जिसके कारण उनकी अनुपस्थिति में ग्रामीण एसपी पेश हुए हैं। अदालत ने उनकी उपस्थिति दर्ज की और राज्य सरकार से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी।

राज्य सरकार का पक्ष और महाधिवक्ता की दलील

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अदालत को अवगत कराया कि संबंधित मामले में कांके थाना प्रभारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि देवव्रत नाथ शाहदेव को एक अलग आपराधिक मामले खूंटी थाना कांड संख्या 03/2026 के तहत विधिवत गिरफ्तार किया गया है और उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है। राज्य के इस जवाब से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई कि वर्तमान हिरासत किसी पुराने मामले के बजाय एक नए प्राथमिकी के तहत की गई है।

अदालत ने कहा- अब सुनवाई का औचित्य नहीं

राज्य सरकार की ओर से दी गई जानकारी सुनने के बाद खंडपीठ ने कहा कि अब इस याचिका पर आगे सुनवाई का कोई औचित्य नहीं रह जाता। चूंकि संबंधित व्यक्ति को दूसरे मामले में न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है, इसलिए हेबियस कॉर्पस याचिका की मूल प्रार्थना अप्रासंगिक हो गई है।

इसके साथ ही अदालत ने याचिका को निष्पादित कर दिया। हालांकि अदालत की पूर्व टिप्पणियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायालय पुलिस की जवाबदेही के प्रश्न को हल्के में नहीं लेता।

हेबियस कॉर्पस याचिका का महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हेबियस कॉर्पस याचिका नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक उपाय है। यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है तो अदालत उससे संबंधित अधिकारी को व्यक्ति को अदालत में प्रस्तुत करने का आदेश दे सकती है।

इस मामले में भी प्रार्थी दामोदर नाथ शाहदेव ने अपने पुत्र की कथित अवैध हिरासत को चुनौती देते हुए यही संवैधानिक उपाय अपनाया था। अदालत की सक्रियता इस बात का संकेत है कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका नागरिक अधिकारों की रक्षा को लेकर सतर्क है।

पुलिस विभाग में जवाबदेही की मांग तेज

अदालत की टिप्पणियों के बाद पुलिस विभाग के भीतर जवाबदेही को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। विभागीय कार्रवाई शुरू होने की जानकारी से यह संकेत मिला है कि मामले को केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में नहीं लिया जा रहा। यदि जांच में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई संभव है। यह मामला भविष्य में पुलिस कार्रवाई की प्रक्रियाओं और गिरफ्तारी के नियमों को लेकर एक मिसाल बन सकता है।

न्यायिक टिप्पणी ने दिया बड़ा संदेश

हालांकि याचिका का औपचारिक निष्पादन हो गया, लेकिन अदालत की मौखिक टिप्पणियों ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आंच आने की स्थिति में अदालतें हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेंगी। यह फैसला न केवल इस मामले से जुड़े पक्षों के लिए बल्कि पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था व्यवस्था के लिए एक संकेत है कि प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।

( रांची दर्पण न्यूज के लिए मुकेश भारतीय की रिपोर्ट )

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