रांची दर्पण डेस्क। झारखंड में लंबे अंतराल के बाद होने जा रहे शहरी निकाय चुनाव ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। गांव-कस्बों तक सीमित रहने वाली सियासी सरगर्मी अब शहरों की गलियों, वार्डों और नगर निगमों तक पहुंच चुकी है। रांची नगर निगम का मेयर पद इस चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण बनकर उभरा है।
वजह साफ है और वह है राजधानी रांची की सियासी, प्रशासनिक और सामाजिक अहमियत। इसी अहमियत ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी खींचतान को जन्म दे दिया है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस, जो राज्य सरकार में सहयोगी हैं, अब रांची मेयर सीट को लेकर आमने-सामने दिखने लगे हैं।
क्यों है इतना अहम शहरी निकाय चुनाव
शहरी निकाय चुनाव केवल स्थानीय प्रशासन चुनने की प्रक्रिया नहीं रह गए हैं। बीते कुछ वर्षों में नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतें विकास, बजट और राजनीतिक प्रभाव के बड़े केंद्र बन चुकी हैं।
रांची जैसे शहर में मेयर की भूमिका सीधे तौर पर शहरी विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट सिटी योजनाओं और जनसुविधाओं से जुड़ी होती है। यही कारण है कि सभी दल अपने मजबूत और चर्चित चेहरों को मैदान में उतारने की रणनीति बना रहे हैं।
लंबे अंतराल के बाद चुनाव, बढ़ा राजनीतिक तापमान
झारखंड में शहरी निकाय चुनाव लंबे समय से लंबित रहे हैं। इस अंतराल में शहरी समस्याएं बढ़ीं। ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन, जलापूर्ति, अतिक्रमण और बेरोजगारी। अब चुनाव की घोषणा के साथ ही राजनीतिक दलों को लग रहा है कि यह जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का बड़ा मौका है। ऐसे में रांची मेयर की कुर्सी प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है।
रांची मेयर पद पर रमा खलखो की दावेदारी
झारखंड महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष और रांची की पूर्व मेयर रमा खलखो ने एक बार फिर मेयर चुनाव लड़ने की इच्छा सार्वजनिक कर दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि जनता और समर्थकों का दबाव है कि वे इस बार भी मैदान में उतरें। उनके अनुसार रांची की जनता ने उनके पिछले कार्यकाल को देखा है और उसी अनुभव के आधार पर वे अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं।
जनता की आवाज पर लड़ूंगी चुनाव: रमा खलखो
रमा खलखो का कहना है कि शहरी निकाय चुनाव भले ही औपचारिक रूप से दलीय आधार पर न हो, लेकिन राजनीतिक समर्थन और संगठनात्मक ताकत इसमें अहम भूमिका निभाती है।
उन्होंने पार्टी फोरम पर अपनी दावेदारी जाहिर कर दी है और संकेत दिया है कि यदि पार्टी नेतृत्व हरी झंडी देता है तो वे पूरी मजबूती से चुनाव लड़ेंगी। उनके समर्थकों का दावा है कि महिला नेतृत्व और प्रशासनिक अनुभव उन्हें मजबूत उम्मीदवार बनाता है।
कांग्रेस के भीतर रमा खलखो को समर्थन
कांग्रेस पार्टी के भीतर रमा खलखो की उम्मीदवारी को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता जगदीश साहू ने उन्हें रांची मेयर पद के लिए योग्य उम्मीदवार बताया है।
उन्होंने कहा कि रमा खलखो पहले भी मेयर रह चुकी हैं और उनके कार्यकाल को रांचीवासियों ने करीब से देखा है। कांग्रेस का संगठन रांची शहर में मजबूत है और पार्टी इस ताकत के साथ चुनाव में उतरने को तैयार है।
तालमेल पर कांग्रेस का रुख
कांग्रेस की ओर से हालांकि यह भी साफ किया गया है कि सहयोगी दलों के साथ तालमेल पर अंतिम फैसला प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी को लेना है।
जगदीश साहू के अनुसार फिलहाल रांची मेयर सीट को लेकर किसी तरह की औपचारिक बातचीत नहीं हुई है। यह बयान साफ संकेत देता है कि कांग्रेस फिलहाल अपने विकल्प खुले रखना चाहती है।
शहरी क्षेत्रों पर फोकस झामुमो की नई रणनीति
दूसरी ओर झामुमो भी रांची मेयर सीट को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। पार्टी के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि झामुमो लंबे समय से ग्रामीण इलाकों में मजबूत रहा है, लेकिन अब पार्टी का फोकस शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने पर है। इसी रणनीति के तहत शहरी निकाय चुनाव को प्राथमिकता दी जा रही है।
दलीय चेतना वाला कार्यकर्ता बने मेयर: झामुमो
सुप्रियो भट्टाचार्य के अनुसार पार्टी नेतृत्व चाहता है कि झामुमो की विचारधारा और दलीय चेतना के साथ जुड़े ऊर्जावान कार्यकर्ता मेयर और अन्य पदों पर चुने जाएं। इसके लिए सभी शहरी निकाय क्षेत्रों के पार्टी पदाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे मजबूत और समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे लाएं। इस बयान से साफ है कि झामुमो रांची मेयर सीट पर अपना ही उम्मीदवार उतारने के मूड में है।
मीडिया में चर्चाएं और झामुमो की आपत्ति
रांची मेयर पद को लेकर मीडिया में रमा खलखो के नाम की चर्चा पर झामुमो नेताओं ने नाराजगी जताई है। कुछ झामुमो नेताओं का कहना है कि किसी एक नाम को भावी मेयर उम्मीदवार बताना मीडिया और कुछ पत्रकारों की दिमागी उपज है। उनका तर्क है कि पार्टी ने अभी तक किसी नाम पर आधिकारिक फैसला नहीं लिया है।
गठबंधन की मजबूरी या सियासी टकराव?
झामुमो और कांग्रेस राज्य सरकार में सहयोगी जरूर हैं, लेकिन शहरी निकाय चुनाव ने उनके रिश्तों की परीक्षा ले ली है। सवाल यह है कि क्या दोनों दल आपसी तालमेल से एक साझा उम्मीदवार उतारेंगे या फिर रांची मेयर सीट पर सीधा मुकाबला देखने को मिलेगा। दोनों ही स्थितियों में राजनीतिक समीकरण दिलचस्प होने वाले हैं।
रांची की जनता के मुद्दे और मेयर की भूमिका
रांची शहर इस समय कई गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। ट्रैफिक जाम, जल संकट, कचरा प्रबंधन, सड़कें और रोजगार जैसे मुद्दे आम जनता के लिए सबसे अहम हैं। ऐसे में मेयर पद का चुनाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक क्षमता की भी परीक्षा है। जनता यह देखना चाहती है कि कौन नेता शहर की समस्याओं को जमीन पर हल कर सकता है।
महिला नेतृत्व बनाम संगठनात्मक ताकत
रमा खलखो की उम्मीदवारी महिला नेतृत्व के सवाल को भी सामने लाती है। महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनका दावा है कि वे महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले वर्गों की आवाज को मजबूती से उठा सकती हैं। वहीं झामुमो संगठनात्मक ताकत और दलीय अनुशासन को अपना मुख्य हथियार मान रहा है।
क्या बिगड़ेगा सत्तारूढ़ गठबंधन का संतुलन?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि रांची मेयर सीट पर झामुमो और कांग्रेस आमने-सामने उतरते हैं तो इसका असर राज्य स्तर के गठबंधन पर भी पड़ सकता है। हालांकि दोनों दल यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि शहरी निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर आधारित हैं और इससे सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
विपक्ष की नजर और रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्षी दल भी नजर बनाए हुए हैं। भाजपा सहित अन्य दलों को उम्मीद है कि सत्तारूढ़ गठबंधन की अंदरूनी खींचतान का फायदा उठाया जा सकता है। यदि वोटों का बंटवारा हुआ तो विपक्ष के लिए राह आसान हो सकती है।
आने वाले दिनों में साफ होगी तस्वीर
फिलहाल रांची मेयर सीट को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कांग्रेस और झामुमो दोनों अपने-अपने दावों को मजबूत करने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में पार्टी नेतृत्व स्तर पर बातचीत होगी और तभी यह तय हो पाएगा कि गठबंधन की मजबूरी भारी पड़ेगी या सियासी महत्वाकांक्षा।
रांची मेयर की कुर्सी पर कांटे की टक्कर तय
इतना तय है कि इस बार रांची मेयर का चुनाव केवल एक स्थानीय चुनाव नहीं रहेगा। यह सत्ता, संगठन और सियासी संतुलन की परीक्षा बन चुका है। रमा खलखो की दावेदारी, कांग्रेस का समर्थन और झामुमो की शहरी रणनीति इन सबने मिलकर रांची की राजनीति को गरमा दिया है। अब देखना यह है कि जनता किसे अपना मेयर चुनती है और किस दल की रणनीति बाजी मारती है।
