
रांची दर्पण डेस्क। राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में मृत मरीजों के परिजनों को तत्काल राहत देने के उद्देश्य से की गई घोषणा अब तक जमीन पर नहीं उतर सकी है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी द्वारा शासी परिषद की बैठक में जिस मानवीय योजना की घोषणा की गई थी, वह तीन महीने बीत जाने के बाद भी कागजों में ही सिमटी हुई है। न तो मृतक के परिजनों को यूपीआइ के माध्यम से मिलने वाली 5,000 रुपये की सहायता राशि मिल पा रही है और न ही शव को घर तक पहुंचाने के लिए मोक्ष वाहन की सुविधा उपलब्ध कराई जा सकी है।
उल्लेखनीय है कि अक्तूबर के प्रथम सप्ताह में हुई रिम्स शासी परिषद की 61वीं बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि रिम्स में इलाज के दौरान किसी मरीज की मृत्यु होने पर उसके परिजनों को तत्काल 5,000 रुपये की सहायता राशि दी जाएगी। साथ ही शव को सम्मानपूर्वक घर तक पहुंचाने के लिए मोक्ष वाहन की व्यवस्था भी की जाएगी।
स्वास्थ्य मंत्री ने उस समय स्पष्ट किया था कि इस योजना पर सालाना लगभग सात करोड़ रुपये का व्यय आएगा और इसका लाभ सभी मरीजों के परिजनों को मिलेगा।
हालांकि, रिम्स प्रशासन का कहना है कि इस योजना के लिए फिलहाल कोई अलग से निर्धारित फंड उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से सहायता राशि देने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार रिम्स के विभिन्न वार्डों में प्रतिदिन औसतन 7,500 से 8,000 मरीज भर्ती रहते हैं और एमआरडी विभाग को रोजाना इलाज के दौरान 27 से 30 मरीजों की मौत की सूचना मिलती है। यदि हर मृत मरीज के परिजन को 5,000 रुपये दिए जाएं, तो रोजाना करीब 1.35 लाख से 1.70 लाख रुपये का खर्च आएगा।
सूत्रों के मुताबिक रिम्स के पास पीएलए फंड में प्लानिंग मद के करीब 2.5 करोड़ रुपये और नॉन-प्लानिंग मद के लगभग 60 करोड़ रुपये मौजूद हैं, लेकिन इन पैसों का उपयोग इस विशेष योजना के लिए नहीं किया जा सकता। रिम्स प्रशासन का तर्क है कि पीएलए फंड की राशि का मासिक खर्च पहले से निर्धारित होता है, इसलिए मृत मरीजों के परिजनों को तत्काल सहायता राशि देने के लिए इसका उपयोग संभव नहीं है।
रिम्स के निदेशक डॉ. राजकुमार ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग से योजना मद में एडवांस फंड उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है। जैसे ही वहां से राशि प्राप्त होगी, योजना को तुरंत लागू कर दिया जाएगा।
वहीं मोक्ष वाहन की खरीद को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। प्रशासन का दावा है कि खरीद की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन अब तक न तो वाहन खरीदा गया है और न ही इसकी समय-सीमा तय की गई है।
इस पूरे मामले ने रिम्स की कार्यप्रणाली और सरकारी घोषणाओं की हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को संवेदनशील और मानवीय बनाने की बात करती है।
वहीं दूसरी ओर मृतकों के परिजनों को राहत देने वाली योजना फाइलों में उलझी हुई है। परिजन आज भी आर्थिक तंगी और शव ले जाने की परेशानी से जूझने को मजबूर हैं, जबकि राहत की घोषणा तीन महीने पहले ही की जा चुकी है।










