भिक्षाटन पर उतरे CIP से हटाए गए निजी सुरक्षाकर्मी, कांके विधायक ने दिया भरोसा

रांची दर्पण डेस्क। केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (CIP) कांके में वर्षों से सेवा दे रहे निजी सुरक्षाकर्मियों को बिना किसी पूर्व सूचना के कार्य से हटाए जाने का मामला अब सड़क से लेकर जनप्रतिनिधियों तक गूंजने लगा है। नौकरी से हटाए गए सुरक्षाकर्मियों ने अपनी पीड़ा और मांगों को समाज के सामने रखने के लिए एक बेहद भावुक और अनोखा तरीका चुना भिक्षाटन।

सीआइपी सुरक्षाकर्मी अधिकार संघर्ष मोर्चा के बैनर तले आंदोलनरत सुरक्षाकर्मियों ने कांके क्षेत्र में दुकानों, फल-ठेलों, चाय की टपरियों, सैलून, राहगीरों और जनप्रतिनिधियों तक जाकर भीख मांगी। भिक्षाटन के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने हाथ में तख्तियां लेकर यह संदेश दिया कि जिन लोगों ने वर्षों तक संस्थान की सुरक्षा में अपनी ड्यूटी निभाई, आज वही अपने हक और रोज़गार के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

आंदोलन कर रहे सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि उन्हें अचानक सेवा से हटा दिया गया, न तो कोई लिखित सूचना दी गई और न ही कारण बताया गया। इससे उनके सामने रोज़ी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। कई सुरक्षाकर्मी परिवार के एकमात्र कमाने वाले हैं, ऐसे में नौकरी जाने से बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।

भिक्षाटन के दौरान जब आंदोलनरत सुरक्षाकर्मी कांके विधायक सुरेश बैठा के पास पहुंचे तो विधायक ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना और भरोसा दिलाया कि इस मामले को लेकर केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने संज्ञान लिया है।

विधायक ने कहा कि सीआइपी निदेशक स्तर पर भी पहल की जा रही है और जल्द ही कोई सकारात्मक समाधान निकलने की उम्मीद है। विधायक के आश्वासन से सुरक्षाकर्मियों में कुछ उम्मीद जगी, लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि जब तक पुनः बहाली नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन अनिश्चितकालीन जारी रहेगा।

इस अनोखे विरोध प्रदर्शन में चंद्र मौलेश्वर कुमार, कृष्ण कुमार सिंह, ऐजाज अंसारी, अजय उरांव, संगीता कुमारी, आशा देवी, विनीता तामांग, रेखा देवी, तस्लीम अंसारी, इम्तियाज अंसारी, मोहन उरांव, कुमुद महली, अमलेंदु जेना, भरत दुबे, दानिश अहमद, दिलीप कुमार सिंह सहित सभी प्रभावित सुरक्षाकर्मी शामिल रहे। पुरुषों के साथ-साथ महिला सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी ने आंदोलन को और भी भावुक बना दिया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह भिक्षाटन सिर्फ भीख मांगने का आंदोलन नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक सशक्त सवाल है कि क्या मेहनतकश कर्मचारियों को बिना सूचना और सम्मान के यूं ही हटाया जा सकता है? अब सबकी नजरें प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कब और क्या ठोस कदम उठाते हैं।

समाचार स्रोत: रांची दर्पण डेस्क के लिए मुकेश भारतीय /मीडिया रिपोर्टस्

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वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले तीन दशक से राजनीति, अर्थ, अधिकार, प्रशासन, पर्यावरण, पर्यटन, धरोहर, खेल, मीडिया, कला, संस्कृति, मनोरंजन, रोजगार, सरकार आदि को लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर बतौर कंटेंट राइटर-एडिटर सक्रिय हैं।
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