रिम्स में हुए नियुक्ति घोटाले में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री पर भी उठे सवाल

“इस नियुक्ति घोटाले में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री से भी पूछताछ होनी चाहिए, तभी निष्पक्ष जांच की उम्मीद की जा सकती है। क्योंकि उन्होंने भी अपनी जिम्मेवारी निभाने में कहीं न कहीं चूक अवश्य की है…

रांची दर्पण / नारायण विश्वकर्मा

रिम्स में नियुक्तियों का विवादों से पुराना नाता है। नियुक्ति घोटाले की खबर रिम्स के लिए सुर्खियां बनती रही हैं। एक बार फिर थर्ड-फोर्थ ग्रेड में 200 लोगों का नियुक्ति घोटाला सुर्खियों में हैं।

इसमें जिस तरह की गड़बड़ियां पकड़ में आयी हैं, मुमकिन है सभी नियुक्तियां रद्द कर दी जायें या फिर गलत तरीके से बहाल किये गये लोगों को ही सिर्फ बर्खास्त कर दिया जाये।

दरअसल, नियुक्तियों में नियम-कायदे की जमकर धज्जियां उड़ायी गयीं हैं। नियुक्तियों में पहुंच-पैरवी और रिश्वत का बाजार गर्म रहा। आरोप है कि रिम्स के बड़े अधिकारियों के कॉकस ने सभी नियम-कायदों को ताक पर रखकर नियुक्ति घोटाला किया है।

उल्लेखनीय है कि झारखंड में नयी सरकार के गठन के बाद विधायक बंधु तिर्की और टीएसी के सदस्यों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलकर उन्हें नियुक्तियों में हुई गड़बड़ियों की जानकारी दी थी।

स्वास्थ्य विभाग के विशेष सचिव चंद्रशेखर उरांव की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में नियुक्ति घोटाले का खुलासा कर दिया है। जांच कमेटी को मिले शिकायत पत्र और रिम्स प्रबंधन की ओर से उपलब्ध कराये गये कागजात के आधार पर कमेटी ने माना है कि नियुक्ति में गड़बड़ी हुई है।

मंत्री को अंधेरे में क्यों रखा गया?

पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी ने भी नियुक्ति पर सवाल उठाया था। उन्हें मनचाहे उम्मीदवारों के चयन के लिए अहर्ता में बदलाव किये जाने की शिकायत मिली थी। सरकार ने थर्ड-फोर्थ ग्रेड की नौकरियों में स्थानीय को शत-प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला लिया था।EX MINISTER

शासी परिषद का अध्यक्ष होने के नाते रिजल्ट जारी करने से पूर्व उनका अनुमोदन लिया जाना था। लेकिन ऐसा नहीं होने पर उन्होंने नियुक्ति पत्र बांटने पर रोक लगा दी थी।

कहा था कि नियुक्ति में गड़बड़ी पाये जाने पर नियुक्ति रद्द कर दी जायेगी, लेकिन बाद में उन्होंने रोक हटाते हुए नियुक्ति पत्र बांटने का आदेश दे दिया।

सवाल उठता है कि अगर मंत्री ने जांचोपरांत नियुक्ति पत्र बांटने का आदेश दिया तो फिर नियुक्ति में गड़बड़ी कैसे हुई? बाहरी लोगों की नियुक्ति कैसे हो गयी? जब थर्ड-फोर्थ ग्रेड की नौकरियों में इंटरव्यू का कोई प्रावधान नहीं है, फिर इंटरव्यू के जरिये नियुक्ति क्यों की गयी?

नियुक्ति के लिए शासी निकाय की अनुमति जरूरी थी, फिर अनुमति लेने में चूक कैसे हो गयी? इसपर मंत्री खामोश क्यों रहे? क्या यह नहीं माना जाये कि जाने-अनजाने गलतियां मंत्री के स्तर से भी हुई है।

एमआरडी में गलत बहाली हुई!

मिली जानकारी के अनुसार मेडिकल रिकॉर्ड विभाग (एमआरडी) में कार्यरत दो कर्मचारी अहर्ता पूरी नहीं करने के बावजूद पैरवी-पहुंच के बल पर नियुक्त कर लिये गये। एमआरडी में नियुक्त किये गये मनींद्र कुमार पटेल झारखंड राज्य के नहीं हैं।

इसके अलावा फेलिक्स एरिक्शन एक्का झारखंडी हैं, लेकिन दोनों के निर्धारित अनुभव शक के दायरे में है. नियमतः तीन साल का अनुभव होना चाहिए था।

अहर्ता के बावजूद पूनम की नियुक्ति क्यों नहीं हुई?

दूसरी तरफ रिम्स में 13 साल से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रही श्रीमती पूनम तिग्गा की नियुक्ति रद्द करने के सवाल पर पूर्व मंत्री ने ध्यान क्यों नहीं दिया? स्क्रूटनी के समय सूची में पूनम का नाम सबसे ऊपर था।

पूनम ने दैनिक वेतनभोगी के रूप में 2007 से लेकर 2010 (तीन साल) तक एमआरडी में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर काम किया। इसके बाद से वह अभी नर्सिंग कॉलेज में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्यरत है।

नियुक्ति के लिए निकाले गये विज्ञापन में कहा गया था कि रिम्सकर्मियों को प्राथमिकता दी जायेगी। यानी सारी अहर्ताएं पूरी करने के बाद भी श्रीमती पूनम तिग्गा की नियुक्ति क्यों नहीं की गयी?

इसका जवाब रिम्स प्रबंधन को देना चाहिए। इसके अलावा पहुंच-पैरवी के बल पर कई बाहरी लोगों का विभिन्न विभागों में चयन किया गया है। जांच में इसका खुलासा हो जाएगा।

सूत्र बताते हैं कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ने मनींद्र पटेल और फेलिक्स एरिक्शन एक्का की नियुक्ति पर आपत्ति की थी। नियुक्ति चयन समिति के सक्रिय सदस्य के रूप में एमआरडी के एचओडी एसबी सिंह, फारमॉक्लॉजी की एचओडी मंजू गाड़ी आदि भी शामिल रहे हैं।

मंत्री ने दोनों कर्मचारियों से बांड भरवाने का निर्देश दिया। बांड में उनसे लिखवाया गया कि दो साल के अंदर इनकी नियुक्ति की अगर जांच हुई और गड़बड़ी पायी गयी तो नियुक्ति रद्द कर दी जायेगी। आफिसियल फाइल में इसे अंकित किया गया है।

ताज्जुब की बात यह है कि दोनों कर्मचारी जब सारी अहर्ताएं पूरी नहीं कर रहे थे, तो फिर बांड भरवाने का क्या मतलब था? सरसरी तौर पर दोनों की नियुक्ति रद्द होनी चाहिए थी। सवाल उठता है कि फिर मंत्री ने कैसी जांच की थी? 

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