Saturday, April 17, 2021

आदिवासी संगठन झुकने को नहीं तैयार, धर्मकोड पर ‘विशेष सत्र’ बुलाए सरकार

2018 में सूचना का अधिकार कानून के तहत अधिवक्ता दीप्ति होरो को झारखंड सरकार के गृह विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक झारखंड में 86 लाख से अधिक आदिवासी हैं.....

यह कितनी अजीब बात है कि आदिवासियों का अपना सरना धर्म होते हुए भी वर्षों से धर्मकोड की मांग होती आ रही है, लेकिन झारखंड की सभी सरकारों ने इस मुद्दे पर कभी गंभीरता नहीं दिखाई। शुक्र है कि हेमंत सरकार सरना धर्मकोड के मामले में शीतकालीन सत्र में प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार को अनुशंसा के लिए भेजेगी। हालांकि आदिवासी संगठन चाहते हैं कि सीएम विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सदन में सरना में धर्मकोड का प्रस्ताव पारित केंद्र सरकार को भेजे।

-: राँची दर्पण / नारायण विश्वकर्मा :-

आदिवासी प्रकृतिपूजक होते हैं। आदिवासियों की ये मान्यता है कि प्रकृति है, तभी जीवन है और आदिवासी समाज का सरना धर्म में अटूट विश्वास है। इसके बावजूद आदिवासियों की धर्म-संस्कृति पर लगातार कुठाराघात होता रहा है।

आज भी झारखण्ड के 86 लाख के करीब सरना आदिवासियों के पास अपने धर्म को सरकारी दस्तावेजों में लिखने की कोई जगह नहीं मिली है। 2021 में देश की अगली जनगणना होनेवाली है।

हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन धर्मावलंबियों के पास अपना धर्म कोड लिखने की गुंजाइश है, लेकिन आदिवासी समाज के पास अपना धर्मकोड नहीं है।

आदिवासी समाज बड़ा तबका प्रकृतिपूजक नहीं : आदिवासी समाज का बड़ा तबका हिन्दू धर्म को नहीं मानता। आदिवासी संगठनों का कहना है कि आदिवासी समाज प्रकृतिपूजक है, जबकि वे हिन्दू धर्म की तरह मूर्तिपूजक नहीं हैं।

इसलिए आदिवासियों को हिन्दू धर्म की श्रेणी में रखना गलत है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि यदि सरना धर्मकोड को लागू नहीं किया जाता है तो 2021 में होनेवाली जनगणना के दौरान आदिवासी समाज हिस्सा नहीं लेगा।

पहली जनगणना में नौवें नबंर पर ‘ट्राइब’ अंकित था : आदिवासियों का कहना है कि 1951 में पहली जनगणना में आदिवासियों के लिए धर्म के कॉलम में नौवें नंबर पर ‘ट्राइब’ उपलब्ध था, जिसे बाद में खत्म कर दिया गया।

अब आदिवासियों का कहना है कि इसे हटाने की वजह से आदिवासियों की गिनती अलग-अलग धर्मों में बंटती गई जिसके चलते उनके समुदाय को काफी नुकसान हुआ है। इस झंझट को दूर करने के लिए स्व. रामदयाल मुंडा ने ‘आदि धर्म’ की वकालत की थी।

हालांकि झारखंड सहित कई राज्यों में आदिवासी खुद को सरना आदिवासी नहीं मानते हैं। वहीं एक बड़ा वर्ग है, जो खुद को हिन्दू धर्म के नजदीक पाता है, तो एक वर्ग ईसाई धर्म के नजदीक।

सरना स्थलों की मिट्टी भेजने पर भी हुआ था बवाल : उल्लेखनीय है कि सरना स्थलों की मिट्टी राम मंदिर के लिए भेजने पर आदिवासी संगठनों के दो धड़ों में ठन गई थी। राम मंदिर निर्माण के लिए देशभर से मिट्टी मंगाई जा रही थी।

झारखंड के भी मंदिरों, सरना स्थलों से मिट्टी भेजी गई थी। आदिवासियों के पूजा स्थल ‘सरना स्थल’ से मिट्टी भेजने को लेकर विवाद हो गया था।

उस समय भी एक गुट का कहना था कि आदिवासी न तो हिन्दू हैं और न ही ईसाई। ऐसे में सरना स्थल से राम मंदिर निर्माण के लिए मिट्टी भेजना गलत है।

झारखंड में 86 लाख से अधिक आदिवासी : 2018 में सूचना का अधिकार कानून के तहत अधिवक्ता दीप्ति होरो को झारखंड सरकार के गृह विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक झारखंड में 86 लाख से अधिक आदिवासी हैं।

इसमें सरना धर्म माननेवालों की संख्या 40,12,622 है। वहीं 32,45,856 आदिवासी हिन्दू धर्म मानते हैं।

ईसाई धर्म माननेवालों की संख्या 13,38,175 है। इसी तरह से मुस्लिम 18,107, बौद्ध 2,946, सिख 984, जैन 381 आदिवासी इन धर्मों को माननेवाले हैं। वहीं 25,971 आदिवासी ऐसे हैं जो किसी भी धर्म को नहीं मानते हैं।

धर्मकोड पर विशेष सत्र बुलाए सरकार: डॉ. करमा उरांव

सरना धर्म रक्षा अभियान के शीर्ष नेता और शिक्षाविद डॉ. करमा उरांव झारखंड विधानसभा के मॉनसून सत्र में सरना धर्म कोड का प्रस्ताव पारित नहीं होने पर नाराजगी जतायी है।

डॉ. उरांव का कहना है कि सीएम हेमंत सोरेन का सदन में जल्दीबाजी दिया गया बयान है, स्पष्ट घोषणा नहीं की है। वे कब और कैसे करेंगे? इसपर उनका स्पष्ट मत आना चाहिए था। इसके कारण आदिवासी संगठनों में बेहद निराशा है।

यह पूछने पर कि आगे की क्या रणनीति है, इसपर उन्होंने कहा कि आदिवासी संगठन इस बात पर एकमत है कि हेमंत सरकार जल्द विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सरना धर्म कोड के बारे में एक लाइन का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजे।

उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो आदिवासी संगठन फिर धरना-प्रदर्शन के लिए मजबूर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि इसबार आदिवासी संगठन आरपार की लड़ाई के मूड में हैं। राज्य ही नहीं, केंद्र पर भी दबाव बनाने के लिए आदिवासी संगठन रणनीति बनाने में जुटा हुआ है। इसके लिए आदिवासी संगठनों के बीच बैठकों का दौर जारी है।

डॉ. उरांव ने एक बार फिर कहा कि जो आदिवासी खुद को हिन्दू, ईसाई या अन्य धर्म मानते हैं, वह अपने को सरना धर्मावलंबी कहना बंद करें।

केंद्र सरकार पर भी दबाव बनाना होगा : दयामनि बारला

सरना आदिवासी समाज धर्मकोड की लंबे समय से मांग कर रहा है, लेकिन झारखंड की सभी सरकारों ने उनकी मांग की अनसुनी की है। जब कोई राजनीतिक दल विपक्ष में होता है तो धर्मकोड लागू करवाने का हिमायती बन जाता है और जब वही विपक्ष सत्ताधारी दल बन जाता है, तो उसे एक झटके में भुला देता है।

यह कहना है सामाजिक कार्यकर्ता दयामनि बारला का।

वह मानती हैं कि जब केंद्र-राज्य में एनडीए की सरकार थी, तो आसानी से सरना धर्मकोड मिल सकता था, लेकिन अब थोड़ा मुश्किल लग रहा है, क्योंकि इस मामले में केंद्र की नीयत साफ नहीं है।

उन्होंने कहा कि 2021 में जनगणना होनेवाली है, तो आदिवासी संगठन सरना धर्म कोड को लेकर एकबार फिर रेस हुए हैं। अब आदिवासी संगठनों को अभी से ही केंद्र पर दबाव बनाने की कोशिश करनी चाहिए। वहीं हेमत सरकार को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर सरना धर्मकोड के लिए एक लाइन का प्रस्ताव सदन से पारित कराकर केंद्र को भेजना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आदिवासी संगठनों को लेकर इसपर मंथन चल रहा है। दिल्ली जाने की भी रणनीति बन रही है।

सरकार पर दबाव बनाने की होगी कोशिश !
बहरहाल, तमाम आदिवासी संगठन आदिवासी समुदाय की धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए सरकारी दस्तावेजों में सरना धर्म कोड को मान्यता दिलाने के लिए संगठित होकर लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है।

अब देखना है कि सीएम आदिवासियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विशेष सत्र बुलाते हैं या नहीं। संभव है आदिवासी संगठनों के शीर्ष नेता सरकार पर दबाव बनाने के लिए सीएम को स्मार पत्र सौंपे।

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