आज वेट लैंड्स डे है- ‘Wet lands of Ranchi’

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रांची दर्पण डेस्क। ये मेरी कुछ तस्वीर रांची तथा उसके आस पास के वेट लैंड्स की है। रांची उन भाग्यशाली शहरों में है जहाँ आज भी कुछ वेटलैंड्स बचे हुए हैं….

धुर्वा से लेके तुपुदाना तथा अनगड़ा तक कुछ वेट लैंड्स बचे हुए हैं। एचइसी से धुर्वा के बीच वेटलैंड है। इनको बचाने की बहुत जरुरत है। जिस तरीके से पर्यावरण असंतुलन हो रहा है तथा जल की कमी हो रही है, वेट लैंड्स की उपयोगिता बढ़ गई है।

रांची के वेटलैंड्स में जैव विविधता के साथ साथ कई तरह के प्रवासी पक्षियों का भी वास रहता है। नदी एवं जलाशय की तरह यह भूमिगत जल रिचार्ज करने का काम करता है।

ये बारिश के जल को इकठ्ठा करता है जो सूखे के दिन काम आता है। ये कार्बन डाइऑक्साइड को भी सोखता है। जिस तरीके से शहर का विकास हो रहा है रांची के वेटलैंड्स पर खतरा बढ़ रहा है।

जलमग्न अथवा आर्द्रभूमि को वेटलैंड कहते हैं। प्राकृतिक अथवा कृत्रिम, स्थायी अथवा अस्थायी, पूर्णकालीन आर्द्र अथवा अल्पकालीन, स्थिर जल अथवा अस्थिर जल, स्वच्छ जल अथवा अस्वच्छ, लवणीय, मटमैला जल- इन सभी प्रकार के जल वाले स्थल वेटलैंड के अन्तर्गत आते हैं।

प्रत्येक वेटलैंड का अपना पर्यातंत्र होता है अर्थात पारिस्थितिक तंत्र होता है। जैव विविधता होती है, वानस्पतिक विविधता होती है। ये वेटलैंड जलजीवों, पक्षियों, आदि प्राणियों के आवास होते हैं।

पृथ्वी पर मनुष्य का जीवन बचा रहे इसके लिये प्रत्येक परिस्थितिक तंत्र का बने रहना जरूरी है। पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन और पारिस्थितिक तंत्र से संतुलन इन दोनों का ही महत्त्व है। आर्द्रभूमि जल को प्रदूषण से मुक्त बनाती है।

आर्द्रभूमि वह क्षेत्र है, जो वर्ष भर आंशिक रूप से या पूर्णतः जल से भरा रहता है। वेटलैंड्स जंतु ही नहीं, बल्कि पादपों की दृष्टि से भी एक समृद्ध तंत्र है, जहाँ उपयोगी वनस्पतियाँ एवं औषधीय पौधे भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

दुनिया की तमाम बड़ी सभ्यताएँ जलीय स्रोतों के निकट ही बसती आई हैं और आज भी वेटलैंड्स विश्व में भोजन प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अर्थात वेटलैंड्स के नज़दीक रहने वाले लोगों की जीविका बहुत हद तक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन पर निर्भर होती है।  (अपने फेसबुक वाल पर प्रख्यात पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी)

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